नई दिल्ली. 8वें केंद्रीय वेतन आयोग ने कर्मचारी संगठनों द्वारा सौंपी गई मांगों की समीक्षा शुरू कर दी है. इस बीच, केंद्रीय कर्मचारियों की अटेंडेंस (उपस्थिति) से जुड़े नियमों में ढील देने का एक बड़ा प्रस्ताव चर्चा में आ गया है. कर्मचारी संगठनों ने आयोग से मांग की है कि दफ्तर देरी से पहुंचने पर लगने वाले मौजूदा जुर्माने और कैजुअल लीव (ष्टरु) की कटौती के सख्त नियमों को बदला जाए. इसकी जगह कर्मचारियों को हर महीने एक निश्चित समय की छूट (ग्रेस पीरियड) दी जानी चाहिए.
नेशनल काउंसिल ऑफ जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (एनसी-जेसीएम) के कर्मचारी पक्ष ने 8वें वेतन आयोग को सौंपे अपने ज्ञापन में अनुरोध किया है कि कर्मचारियों को प्रति माह कुल 120 मिनट (2 घंटे) की देरी से आने की संचयी छूट दी जाए. इस ग्रेस पीरियड के भीतर रहने पर कर्मचारी पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. यूनियनों का तर्क है कि बड़े शहरों में बढ़ती ट्रैफिक जाम की समस्या और दफ्तरों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम की अनिवार्यता के कारण कर्मचारी अक्सर कुछ मिनट लेट हो जाते हैं. नए प्रस्ताव के अनुसार, जब किसी कर्मचारी की कुल लेट-लतीफी महीने में 120 मिनट से अधिक हो, तभी उसकी आधे दिन की कैजुअल लीव (सीएल) काटी जानी चाहिए.
क्या हैं वर्तमान नियम?
मौजूदा व्यवस्था के तहत, केंद्रीय कर्मचारियों को एक महीने में केवल दो बार अधिकतम एक-एक घंटे की देरी से आने की अनुमति है, जिस पर कोई जुर्माना नहीं लगता. हालांकि, अगर कोई कर्मचारी महीने में तीसरी बार या उससे ज्यादा बार लेट होता है, तो हर अतिरिक्त लेट एंट्री के बदले उसके खाते से सीधे आधे दिन की कैजुअल लीव काट ली जाती है. कर्मचारी यूनियनों का कहना है कि यह नियम व्यावहारिक नहीं है और यह महानगरों में सफर करने वाले कर्मचारियों की दैनिक चुनौतियों को ध्यान में नहीं रखता.
एनसी-जेसीएम के प्रस्ताव के मुख्य बिंदु
कर्मचारियों को हर महीने कुल 120 मिनट की लेट अटेंडेंस की छूट मिले. इस तय सीमा के भीतर कोई भी छुट्टी या वेतन नहीं काटा जाए.
महीने भर की कुल देरी 120 मिनट का आंकड़ा पार करने पर ही आधे दिन की कैजुअल लीव काटी जाए.
यह प्रस्ताव अनिवार्य रूप से लेट आने की बारंबारता (नंबर ऑफ टाइम्स) के बजाय महीने भर में हुई कुल देरी (टोटल ड्यूरेशन) पर ध्यान केंद्रित करने की वकालत करता है.
बेहतर लाभों की मांग
अटेंडेंस में सुधार के अलावा, कर्मचारी प्रतिनिधियों ने कार्य-संबंधी बीमारी और चोट अवकाश के प्रावधानों में भी संशोधन की मांग की है.
एनसी-जेसीएम ने मांग रखी है कि यदि कोई कर्मचारी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान घायल होता है, तो उसे इसअवधि के दौरान पूरा वेतन मिलना चाहिए और वर्कमैन कंपनसेशन एक्ट के तहत मिलने वाले मुआवजे के नाम पर इस वेतन में कोई कटौती नहीं होनी चाहिए. इसके अलावा, इस अवकाश के दौरान भी कर्मचारी के लीव क्रेडिट (अर्जित छुट्टियां) सामान्य रूप से जुड़ते रहने चाहिए.
किसे मिलेगा इसका लाभ?
8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से देश के 1.1 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को सीधा फायदा होगा, जिनमें वर्तमान केंद्रीय कर्मचारी, पेंशनभोगियों और उनके परिवार के सदस्य शामिल हैं. भारत में अब तक सात वेतन आयोगों का गठन किया जा चुका है. देश के पहले वेतन आयोग की स्थापना जनवरी 1946 में हुई थी और इसके बाद से आमतौर पर हर 10 साल के अंतराल पर नए वेतन आयोग का गठन किया जाता रहा है.
