जबलपुर। जिले में शराब ठेकेदारों और आबकारी अधिकारियों की मिलीभगत से लंबे समय से जारी अवैध ओवररेटिंग का खेल आखिरकार उजागर हो गया है। काउंटर पर हर बोतल से होने वाली अतिरिक्त वसूली सीधे रसूखदारों की जेबों में जा रही थी, जिससे आम उपभोक्ताओं में भारी आक्रोश था। इस बीच, बाजार के ही एक दूसरे धड़े ने इस सिंडिकेट के एकाधिकार और एक करोड़ रुपये महीने के कथित लेन-देन के खिलाफ मोर्चा खोलकर तगड़ा हड़कंप मचा दिया। जनता के गुस्से और इस अंदरूनी बगावत के बाद जब जिला प्रशासन ने सख्त तेवर दिखाए, तब जाकर आबकारी विभाग ने अपनी साख बचाने के लिए आनन-फानन में जिले की सभी 143 शराब दुकानों पर रेट लिस्ट लगाना अनिवार्य कर दिया है। शहरी क्षेत्र की 72 और ग्रामीण क्षेत्रों की 71 दुकानों को नोटिस जारी कर एमआरपी से अधिक दाम लेने पर कार्रवाई की चेतावनी तो दी गई है, लेकिन पूर्व में आशीष शिवहरे और सोम ग्रुप जैसे बड़े नामों से जुड़े इस संगठित तंत्र के रसूख को देखते हुए इस सरकारी कदम को महज एक प्रशासनिक खानापूर्ति माना जा रहा है।
विभागीय साख बचाने के लिए कागजी कार्रवाई का सहारा
लगातार मिल रही शिकायतों और ऑनलाइन भुगतान के पुख्ता सबूत भोपाल तक पहुंचने के बावजूद जिम्मेदार तंत्र पूरी तरह मौन साधे बैठा था। जब सिंडिकेट की आपसी खींचतान के कारण मामला सार्वजनिक हुआ और साख पर आंच आई, तब जाकर विभाग ने अपनी नाक बचाने के लिए इन नोटिसों का सहारा लिया है। नियम के मुताबिक अब हर दुकान की दीवार पर ब्रांड वार मूल्य सूची चटकाना तय हुआ है, लेकिन करीब 20 प्रतिशत अधिक दाम वसूलने के आदी हो चुके ठेकेदार इसका कितना पालन करेंगे, इस पर गंभीर सवाल हैं। करोड़ों के इस गुप्त खेल के आगे विभाग का यह कागजी आदेश केवल दिखावा साबित होने की पूरी आशंका है। यह बदलाव किसी सरकारी निरीक्षण का नतीजा नहीं, बल्कि उन जागरूक ग्राहकों की देन है जिन्होंने अधिक वसूली का विरोध कर सीधे ट्रांजैक्शन स्लिप विभाग को भेजी थीं। जनता के इस सीधे विरोध और आंतरिक गुटबाजी के कारण ही व्यवस्था को झुकना पड़ा है, लेकिन बिना कड़े जमीनी एक्शन के इस लूट पर पूरी तरह लगाम लगाना नामुमकिन नजर आता है।
