जबलपुर. फैमिली पेंशन को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं रखा जा सकता. यदि अविवाहित, विधवा और विवाहित बेटियों को परिवार का सदस्य माना जाता है तो केवल वैवाहिक स्थिति बदल जाने के आधार पर तलाकशुदा बेटी को इस अधिकार से वंचित करना संविधान के समानता के सिद्धांत के खिलाफ होगा.
अदालत ने कहा कि ऐसा करना अनुच्छेद 14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है. यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए राहत लेकर आया है जो तलाक के बाद अपने माता-पिता पर आश्रित रहती हैं और सामाजिक तथा आर्थिक चुनौतियों का सामना करती हैं.
जबलपुर निवासी ज्योति श्रीवास्तव की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने न केवल पेंशन नियमों की नई व्याख्या की, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य किसी वर्ग को अधिकारों से वंचित करना नहीं बल्कि समान अवसर उपलब्ध कराना है. अदालत ने पाया कि पेंशन नियमों में तलाकशुदा बेटी का स्पष्ट उल्लेख नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि उसे परिवार से बाहर मान लिया जाए. न्यायालय ने इस मामले में उदार और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए संबंधित विभाग को निर्धारित समय सीमा में याचिकाकर्ता को फैमिली पेंशन का लाभ देने के निर्देश दिए हैं.
ये है पूरा मामला
मामला जबलपुर निवासी ज्योति श्रीवास्तव से जुड़ा है. उनके पिता शंकर लाल श्रीवास्तव होमगार्ड विभाग में जिला कमांडेंट पद पर कार्यरत थे. वर्ष 2001 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपनी तलाकशुदा बेटी को फैमिली पेंशन के लिए नॉमिनी बनाया था क्योंकि वह उन पर आश्रित थी. पिता के निधन के बाद जब पेंशन लाभ का मामला सामने आया तो विभाग ने यह कहते हुए आवेदन निरस्त कर दिया कि तलाकशुदा बेटी परिवार की श्रेणी में नहीं आती. इसके बाद ज्योति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
जानें हाईकोर्ट ने और क्या कहा?
जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पेंशन नियम 1976 में अविवाहित, विधवा और विवाहित बेटियों को परिवार का सदस्य माना गया है. ऐसे में तलाकशुदा बेटी को अलग श्रेणी में रखकर अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. अदालत ने टिप्पणी की कि जब विवाहित बेटी को परिवार का सदस्य माना जा सकता है तो तलाकशुदा बेटी को परिवार से बाहर मानने का कोई तार्किक आधार नहीं है. यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा.
समानता के अधिकार को सर्वोपरि माना
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कानून की व्याख्या सामाजिक वास्तविकताओं और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए. आज बड़ी संख्या में महिलाएं तलाक के बाद अपने मायके और माता-पिता पर निर्भर रहती हैं. ऐसी स्थिति में केवल नियमों में नाम का उल्लेख न होने के आधार पर उन्हें अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. अदालत ने समानता के अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए उदार व्याख्या अपनाई.
