जबलपुर। गैंगस्टर हाजी अब्दुल रज्जाक को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से बड़ा कानूनी झटका लगा है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीजन बेंच ने रज्जाक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज करते हुए उसे तत्काल रिहा करने से मना कर दिया है। रज्जाक ने रासुका अर्थात राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की कार्रवाई को चुनौती देकर अपनी हिरासत को पूरी तरह अवैध बताया था और राजनीतिक द्वेष के तहत मामले दर्ज करने के आरोप लगाए थे। इस मामले में पहले आरोपी पक्ष द्वारा विधायक संजय पाठक पर भी साजिश के आरोप मढ़े गए थे, परंतु बाद में वरिष्ठ अधिवक्ता संजय के अग्रवाल के तर्कों के बाद रज्जाक पक्ष ने आरोपों को वापस ले लिया, जिसके बाद कोर्ट ने विधायक पर कोई आदेश पारित नहीं किया। हाईकोर्ट ने दोटूक कहा कि सीधे रिट क्षेत्राधिकार से रिहाई नहीं मिल सकती, इसके लिए सक्षम अदालत में नियमित जमानत याचिका ही दायर करनी होगी।
रासुका की कार्रवाई और अवैध हिरासत का दावा
याचिकाकर्ता हाजी अब्दुल रज्जाक ने अदालत के समक्ष तर्क दिया था कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा उन पर बार-बार रासुका के तहत कार्रवाई की गई। याचिका में मुख्य रूप से यह बात उठाई गई थी कि राज्य स्तरीय सलाहकार बोर्ड ने 3 बार लगाए गए रासुका के आदेशों को मंजूरी नहीं दी थी और उन्हें रद्द कर दिया था। इसके बावजूद पुलिस प्रशासन द्वारा द्वेषवश नए और पुराने मामलों को आधार बनाकर उन्हें लगातार जेल में बंद रखा गया। आरोपी पक्ष ने इसे पूरी तरह गैरकानूनी बंदी और प्रताड़ना की एक सोची-समझी श्रृंखला करार दिया था, जिसे कोर्ट ने रिहाई का सीधा आधार मानने से साफ इनकार कर दिया।
नियमित जमानत और न्याय व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांत
डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान भारतीय न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों का विशेष रूप से उल्लेख किया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश की न्याय व्यवस्था जेल नहीं बल्कि बेल के सिद्धांत पर काम करती है, परंतु इसका लाभ उठाने के लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना बेहद जरूरी है। किसी भी बंदी को सीधे हाईकोर्ट से रिट याचिका के माध्यम से रिहाई का आदेश जारी नहीं किया जा सकता। इसके लिए आरोपी को कानून के दायरे में रहकर संबंधित निचली या सक्षम अदालत के समक्ष ही नियमित जमानत के लिए विधिवत आवेदन प्रस्तुत करना होगा।
पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सख्त हिदायत
भले ही अदालत ने आरोपी को तुरंत छोड़ने से मना कर दिया, लेकिन पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के तौर-तरीकों को लेकर गंभीर रुख अपनाया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि हर नागरिक और आरोपी का यह संवैधानिक अधिकार है कि उसे अपने खिलाफ दर्ज मामलों की सटीक जानकारी मिले। कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए कि यदि रज्जाक के खिलाफ कोई भी नया मामला दर्ज किया जाता है, तो इसकी सूचना 24 घंटे के भीतर आरोपी और उसके परिजनों को देना अनिवार्य होगा। साथ ही पुलिस को सभी लंबित मुकदमों की सूची सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने को कहा गया है।
पारदर्शिता के लिए सीसीटीएनएस प्रणाली का अनिवार्य उपयोग
अदालत ने तकनीकी व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए पुलिस को सूचनाओं के आदान-प्रदान में लापरवाही न बरतने की चेतावनी दी। पीठ ने कहा कि वर्तमान समय में पूरे मध्यप्रदेश में क्राइम एंड क्रिमिनल Tracking नेटवर्क एंड सिस्टम्स अर्थात सीसीटीएनएस सुचारू रूप से संचालित हो रहा है। डिजिटल प्रणाली के लागू होने के कारण अब पुलिस अधिकारी जानकारी देने में देरी या किसी भी प्रकार का बहाना नहीं बना सकते। रज्जाक और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज सभी पुराने व लंबित मामलों की सूची जल्द से जल्द सामने लानी होगी ताकि वे अपने बचाव में आवश्यक कानूनी कदम उठा सकें।
