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पुस्तक मेला: शिक्षा के नाम पर सरेआम डकैती: विधायक विश्नोई ने उड़ाई प्रशासनिक इकबाल की धज्जियां


जबलपुर। शहर में पुस्तक मेले के आयोजन को लेकर राजनीति गरमा गई है। पाटन विधायक डॉ. अजय विश्नोई ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाते हुए व्यवस्थाओं को कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए आरोप लगाया है कि प्रशासनिक ढिलाई के चलते पुस्तक विक्रेताओं का सिंडिकेट एक बार फिर सक्रिय हो गया है। विधायक के अनुसार नेतृत्व परिवर्तन के साथ ही अधिकारियों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं जिसका सीधा खामियाजा आम अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने वर्तमान कलेक्टर की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासन की अरुचि ने व्यापारियों को मनमानी वसूली का मौका दे दिया है।

​पिछले साल की सख्ती और वर्तमान सुस्ती का अंतर

​विधायक ने साल 2024 के दौरान हुई प्रशासनिक कार्रवाई का उल्लेख करते हुए मौजूदा हालातों की तुलना की है। उन्होंने बताया कि पूर्व कलेक्टर दीपक सक्सेना ने निजी स्कूलों और पुस्तक विक्रेताओं के बीच पनप रहे अनैतिक गठजोड़ को तोड़ने के लिए बेहद सख्त कदम उठाए थे। उस दौरान पुस्तक मेले का मुख्य उद्देश्य ही यह था कि स्टेशनरी और किताबों के बाजार पर सरकारी नियंत्रण स्थापित हो सके और मध्यमवर्गीय परिवारों को आर्थिक राहत मिले। डॉ. विश्नोई का मानना है कि जैसे ही प्रशासन के मुखिया ने इस विषय से दूरी बनाई, पूरी व्यवस्था वापस पुराने ढर्रे पर लौट आई है। उनके अनुसार वर्तमान में निजी स्वार्थ और भ्रष्टाचार का गठबंधन फिर से प्रभावी हो गया है।

​व्यापारियों के सिंडिकेट और मूल्य नियंत्रण का सच

​डॉ. विश्नोई ने वर्तमान स्थिति पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जब तक जिम्मेदार अधिकारी जमीन पर उतरकर निगरानी नहीं करते, तब तक व्यापारियों का समूह हावी रहता है। उन्होंने प्रशासनिक सख्ती में कमी को विक्रेताओं के लिए मुनाफे का बड़ा जरिया बताया। आरोप है कि मेले के आयोजन के बाद भी अभिभावकों को महंगी स्टेशनरी और किताबों के पूरे सेट खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। विधायक ने स्पष्ट किया कि सत्ता के केंद्र में बदलाव आते ही कार्यशैली बदल गई है, जिससे भ्रष्ट तत्वों को फलने-फूलने का नया अवसर मिल गया है। इस उदासीनता के कारण बाजार में मूल्य नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

​भारी डिस्काउंट और लागत मूल्य का गणित

​अभिभावकों को जागरूक करते हुए विधायक ने कॉपियों पर मिलने वाली छूट के पीछे का सच साझा किया है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कॉपियों पर जो 60 प्रतिशत तक का डिस्काउंट दिया जा रहा है, वह वास्तव में इसकी वास्तविक कीमत की असलियत उजागर करता है। उनके तर्क के अनुसार यदि कोई विक्रेता इतनी बड़ी छूट देने की स्थिति में है, तो इसका मतलब साफ है कि उन कॉपियों की वास्तविक लागत छपे हुए मूल्य यानी एमआरपी से आधे से भी कम है। उन्होंने पालकों को आगाह किया कि वे केवल विज्ञापित छूट के झांसे में न आएं क्योंकि अन्य आवश्यक शिक्षण सामग्री पर कोई राहत नहीं दी जा रही है।

​शिक्षा के नाम पर जारी लूट रोकने की मांग

​विधायक का हमला केवल मेले के अव्यवस्थाओं तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने शिक्षा के बाजारीकरण पर व्यापक चिंता जताई। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण शहर के नागरिक ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। डॉ. विश्नोई ने मांग की है कि पुस्तक विक्रेताओं और निजी शिक्षण संस्थानों के बीच चल रहे इस गठजोड़ को समाप्त करने के लिए फिर से उसी पुराने कड़े रुख की जरूरत है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जब तक शासन का डर नहीं होगा, तब तक अभिभावकों का शोषण बंद नहीं होगा। इस बयान के बाद जिले के प्रशासनिक हलकों और शिक्षा जगत में हलचल तेज हो गई है।

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