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अधिवक्ता मारपीट प्रकरण: हाईकोर्ट में याचिका दायर होते ही आरक्षक पर दर्ज हुआ मुकदमा

 


जबलपुर। बीते 11 अप्रैल को अधिवक्ता व पुलिस आरक्षक के बीच हुई मारपीट में अब न्यायालय के दखल के बाद एफआईआर दर्ज की गई है। दरअसल,सिविल लाइन थाना पुलिस द्वारा सुनवाई न होने पर अधिवक्ता ने 23 अप्रैल को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। न्यायालय की शरण में जाते ही पुलिस प्रशासन सक्रिय हुआ और घटना के 14 दिन बाद 25 अप्रैल को आरक्षक साकेत तिवारी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। हालांकि अधिवक्ता धर्मेंद्र सोनी ने इस एफआईआर की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि प्राथमिकी दर्ज करते समय पीड़ित को सूचित नहीं किया गया और दस्तावेजों पर किसी अन्य व्यक्ति के हस्ताक्षर करवा लिए गए। साथ ही इसमें एक ऐसे पुलिसकर्मी का नाम भी शामिल कर दिया गया, जिसका घटना से कोई लेना-देना नहीं था। इस बीच आरोपी आरक्षक ने अपना किराए का मकान खाली कर दिया है। अब इस पूरे प्रकरण की सुनवाई 29 अप्रैल को जस्टिस बीपी शर्मा की अदालत में निर्धारित है।

क्या था विवाद का घटनाक्रम

​जबलपुर के सिविल लाइन थाना क्षेत्र स्थित समीक्षा टाउन में एक पुलिस आरक्षक द्वारा हाईकोर्ट के अधिवक्ता के साथ घर में घुसकर मारपीट करने की घटना सामने आई । यह पूरा विवाद बच्चों के शोर मचाने जैसी मामूली बात से शुरू हुआ था जिसने बाद में हिंसक रूप ले लिया। घटना 11 अप्रैल की शाम की है जब अधिवक्ता पंकज शर्मा के घर के बाहर बच्चे शोर कर रहे थे। अधिवक्ता की पत्नी ने जब बच्चों को शोर करने से मना किया तो पास में ही किराए से रहने वाले मदनमहल थाने के आरक्षक साकेत तिवारी ने गाली-गलौच शुरू कर दी। विवाद बढ़ने पर आरक्षक ने अधिवक्ता के घर में प्रवेश कर उन पर हमला कर दिया जिससे उनके चेहरे पर चोटें आईं। इस दौरान बीच-बचाव करने आए पड़ोसियों और महिलाओं के साथ भी अभद्रता की गई।

सीसीटीवी साक्ष्य के बाद भी पुलिस की टालमटोल

​मारपीट की घटना के तुरंत बाद पीड़ित अधिवक्ता पंकज शर्मा सीसीटीवी फुटेज लेकर सिविल लाइन थाने पहुंचे थे। आरोप है कि साक्ष्य उपलब्ध होने के बाद भी थाना प्रभारी और स्टाफ ने तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं की। पीड़ित को लगभग 3 घंटे तक थाने में बैठाकर रखा गया और उन पर आरक्षक के साथ समझौता करने के लिए मानसिक दबाव बनाया गया। पुलिस विभाग के ही कर्मचारी का मामला होने के कारण कार्रवाई में देरी की गई जिससे आहत होकर अधिवक्ता ने कानूनी मार्ग अपनाने का निर्णय लिया।

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