जबलपुर। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने के निर्णय के बाद उपजे कानूनी विवाद पर अब निर्णायक सुनवाई होने जा रही है। जबलपुर स्थित हाई कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में लंबित सभी याचिकाओं पर 27 अप्रैल से नियमित सुनवाई करने का आदेश जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने स्पष्ट किया है कि 27 से 29 अप्रैल तक प्रतिदिन दोपहर 12:30 बजे से इन प्रकरणों पर विस्तृत बहस सुनी जाएगी। न्यायालय ने प्रकरण से जुड़े सभी पक्षों को निर्देशित किया है कि वे निर्धारित तिथि से पहले अपने लिखित उत्तर और आवश्यक दस्तावेज अनिवार्य रूप से प्रस्तुत कर दें। इस सुनवाई के दौरान ओबीसी आरक्षण के साथ-साथ राज्य सरकार द्वारा विभिन्न सरकारी भर्तियों में 13 प्रतिशत पदों को रोके जाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी विचार किया जाएगा।
तीन दिवसीय विशेष सुनवाई का शेड्यूल जारी
आरक्षण विवाद की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने लगातार तीन दिनों तक सुनवाई करने का निर्णय लिया है। यह कानूनी प्रक्रिया वर्ष 2019 में अशिता दुबे और अन्य द्वारा दायर की गई उस याचिका से शुरू हुई थी जिसमें आरक्षण वृद्धि के संवैधानिक पहलुओं पर सवाल उठाए गए थे। समय के साथ इस मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में सैकड़ों नई याचिकाएं जुड़ती गईं जिससे यह प्रदेश का सबसे बड़ा कानूनी प्रकरण बन गया। गुरुवार को हुई अदालती कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी और ओबीसी वर्ग के पक्ष में विशेष अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर व वरुण ठाकुर ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सरकार का पक्ष रखने के लिए महाधिवक्ता प्रशांत सिंह, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराज और अतिरिक्त महाधिवक्ता बीडी सिंह मौजूद रहे।
सुप्रीम कोर्ट से वापस लौटे प्रकरणों पर विचार
उल्लेखनीय है कि पूर्व में राज्य सरकार के अनुरोध पर इन सभी प्रकरणों को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था। हालांकि 19 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को वापस मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया था कि इनका निपटारा वहीं किया जाए। गुरुवार को सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराज ने अपनी अन्य व्यस्तताओं का हवाला देते हुए न्यायालय से समय मांगा। उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने 27 अप्रैल की तिथि तय की है। अब इस अंतिम सुनवाई के माध्यम से यह तय होगा कि प्रदेश की सरकारी नियुक्तियों और शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी वर्ग को मिलने वाले आरक्षण की सीमा क्या होगी और होल्ड किए गए 13 प्रतिशत पदों का भविष्य क्या होगा।
