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मंत्री प्रतिमा बागरी की बढ़ेंगी मुश्किलें, हाईकोर्ट ने 60 दिन में मांगी रिपोर्ट

जबलपुर. मध्य प्रदेश के सतना जिले की रैगांव विधानसभा सीट से भाजपा विधायक और राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। प्रतिमा बागरी के खिलाफ दायर फर्जी प्रमाण पत्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए एमपी हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है। शुक्रवार 24 अप्रैल को हाईकोर्ट में प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर सुनवाई हुई और कोर्ट ने प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर सरकार से 60 दिन में रिपोर्ट मांगी है। हाईकोर्ट ने ये भी कहा है कि सरकार के द्वारा दी गई रिपोर्ट की उच्च स्तरीय समिति जांच करेगी।

 60 दिन में सरकार पेश करे रिपोर्ट

हाईकोर्ट की डबल बेंच, न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति अविनेद्र कुमार सिंह ने याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि पिछले लगभग 1 वर्ष से इस मामले की जांच लंबित क्यों रखी गई और इसे दबाकर क्यों रखा गया। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देशित किया है कि उच्च स्तरीय छानबीन समिति इस मामले की 60 दिनों (दो माह) के भीतर जांच कर निर्णय प्रस्तुत करे। कोर्ट ने 20 जून तक का समय छानबीन समिति को दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकेश अग्रवाल ने इस मामले में पैरवी की।

कांग्रेस नेता ने दायर की है याचिका

राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के प्रमाण पत्र को फर्जी बताते हुए कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। प्रदीप अहिरवार ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि मंत्री प्रतिमा बागरी ने प्रशासनिक मिलीभगत से फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर सतना जिले की एससी आरक्षित रैगांव सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की और राज्यमंत्री बनी हैं। कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने अपनी याचिका में 1961 और 1971 की जाति जनगणना का हवाला देते हुए बताया है कि पन्ना, सतना और सिवनी जिलों में बागरी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल नहीं किया गया था। इसके साथ ही उन्होंने 2003 में राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति के निर्णय और 2007 में केंद्र सरकार के राजपत्र का भी उल्लेख याचिका में किया है, जिसमें राजपूत समुदाय के बागरी को एससी श्रेणी में नहीं माना गया। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो मंत्री के खिलाफ संवैधानिक कार्रवाई की जाए।

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