khabar abhi tak

जबलपुर का डॉ. हेमलता श्रीवास्तव प्रॉपर्टी केस: पेशी में नहीं पहुंचे दावेदार, रजिस्ट्री स्टाफ में हड़कंप


एसडीएम न्यायालय में हुई हालिया सुनवाइयों के दौरान एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इस मामले के मुख्य पक्षकार अदालत से किनारा करते नजर आए


जबलपुर। राइट टाउन क्षेत्र में स्थित लगभग 50 करोड़ रुपये की बेशकीमती संपत्ति को लेकर चल रहा विवाद अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। डॉ. हेमलता श्रीवास्तव से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल प्रॉपर्टी केस में अधारताल एसडीएम कोर्ट ने अपनी सुनवाई पूरी कर ली है और फैसला सुरक्षित रख लिया है। बताया जा रहा है कि आदेश पूरी तरह तैयार है और किसी भी दिन इस पर अंतिम मुहर लग सकती है। इस मामले में जिला प्रशासन की सक्रियता और नगर निगम की सख्त कार्रवाई के बाद अब उन पक्षों में भारी बेचैनी देखी जा रही है जिन्होंने विवादित दानपत्र और वसीयत के आधार पर इस संपत्ति पर अपना दावा पेश किया था।

सुनवाई से नदारद रहे दावेदार और करोड़ों का फंसा निवेश

​एसडीएम न्यायालय में हुई हालिया सुनवाइयों के दौरान एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इस मामले के मुख्य पक्षकार अदालत से किनारा करते नजर आए। 27 फरवरी को हुई महत्वपूर्ण सुनवाई में न तो दानपत्र के माध्यम से मालिकाना हक जताने वाले डॉ. सुमित जैन और डॉ. प्राची जैन उपस्थित हुए और न ही वसीयत का दावा करने वाले गायत्री मंदिर ट्रस्ट का कोई प्रतिनिधि पहुंचा। अदालत में केवल डॉ. हेमलता श्रीवास्तव के देवर बीएल श्रीवास्तव के भाई हाजिर हुए, जिन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि "प्रॉपर्टी के असली वारिस हम हैं और बाकी सभी दावे गलत और फर्जी हैं।" कानूनी जानकारों का मानना है कि अंतिम सुनवाई से दावेदारों का गायब रहना उनके कमजोर पक्ष को दर्शाता है। गौरतलब है कि डॉ. सुमित जैन और डॉ. प्राची जैन ने इस संपत्ति के लिए करीब ढाई करोड़ रुपये डॉ. हेमलता की बहन को दिए थे और लगभग 70 लाख रुपये की स्टाम्प ड्यूटी चुकाई थी। वर्तमान में उनके करोड़ों रुपये डूबने की कगार पर हैं और पुलिस एफआईआर दर्ज होने के बाद से दोनों डॉक्टर फरार बताए जा रहे हैं।

सब-रजिस्ट्रार की भूमिका और नियमों का गंभीर उल्लंघन

​इस पूरे प्रकरण में सरकारी तंत्र की मिलीभगत और नियमों की अनदेखी भी प्रमुखता से उभरी है। विशेष रूप से तत्कालीन उपपंजीयक (सब-रजिस्ट्रार) किशोर बारापत्रे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं। जांच में यह बात सामने आई है कि डॉ. हेमलता श्रीवास्तव की मानसिक स्थिति रजिस्ट्री करने के योग्य नहीं थी और इसके लिए डॉ. कोरिया द्वारा 'अनफिट सर्टिफिकेट' भी जारी किया गया था। इसके बावजूद, उन्हें एम्बुलेंस और स्ट्रेचर के जरिए रजिस्ट्री कार्यालय लाकर दानपत्र और वसीयत का पंजीकरण किया गया। सब-रजिस्ट्रार ने इस तथ्य को भी नजरअंदाज किया कि यह जमीन नगर निगम की लीज प्रॉपर्टी थी, जिसका 2019 के बाद नवीनीकरण नहीं कराया गया था और न ही हस्तांतरण के लिए एनओसी ली गई थी। इसके अतिरिक्त, आवासीय उपयोग के लिए आरक्षित इस भूमि का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था, जिससे शासन को मिलने वाली स्टाम्प ड्यूटी में भी भारी चूना लगाया गया। डॉ. हेमलता ने अपने जीवित रहते एसडीएम को दिए बयान में स्पष्ट कहा था कि मेरे साथ धोखाधड़ी हुई है, मैंने तो केवल मेमोरियल अस्पताल बनाने के लिए दान की बात कही थी, इसे बेचने का अधिकार कभी नहीं दिया।

नगर निगम का कब्जा और कानूनी विशेषज्ञों का अनुमान

​प्रशासनिक स्तर पर इस मामले में बड़ी सफलता तब मिली जब नगर निगम कमिश्नर ने लीज की शर्तों के उल्लंघन को आधार बनाकर इस 25,471 वर्ग फुट की जमीन को वापस अपने अधिकार में ले लिया। वर्तमान में वहां नगर निगम का कार्यालय भी शुरू हो चुका है और बोर्ड हटा दिए गए हैं। कलेक्टर के निर्देशों पर मदन महल पुलिस ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश तेज कर दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि जिस तरह के पुख्ता सबूत और गवाह एसडीएम कोर्ट के समक्ष आए हैं, उससे यह लगभग तय माना जा रहा है कि फर्जी तरीके से तैयार किए गए दानपत्र और वसीयत को निरस्त कर दिया जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि जब मूल मालिक ने खुद धोखाधड़ी की पुष्टि की है और मानसिक अक्षमता के प्रमाण मौजूद हैं, तो ऐसे दस्तावेजों की कानूनी वैधता शून्य हो जाती है। अब शहर की निगाहें एसडीएम कोर्ट के उस अंतिम आदेश पर टिकी हैं जो जबलपुर के भू-माफियाओं और फर्जी रजिस्ट्री करने वालों के लिए एक बड़ी नजीर साबित हो सकता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post
khabar abhi tak
khabar abhi tak
khabar abhi tak