अनुभव और वरिष्ठता को दरकिनार करने के निर्णय से मध्य प्रदेश कर्मचारी संघ में नाराजगी
जबलपुर। जबलपुर में शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी को अनिवार्य किए जाने के सरकारी निर्णय का पुरजोर विरोध शुरू हो गया है। मध्य प्रदेश कर्मचारी संघ ने इस कदम को वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के सम्मान के विरुद्ध बताते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है। शिक्षकों का तर्क है कि जो शिक्षक 25 से 28 वर्ष की लंबी सेवा दे चुके हैं और सेवानिवृत्ति के करीब हैं, उन्हें अब अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए परीक्षा देना अनुचित है। यह स्थिति उन शिक्षकों के लिए भी अपमानजनक है जिन्होंने अपने करियर के दौरान उत्कृष्ट कार्य के लिए शिक्षक सम्मान प्राप्त किया है।
प्रक्रिया पर उठ रहे गम्भीर सवाल
विरोध प्रदर्शन के दौरान संघ के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में कार्यरत शिक्षकों की नियुक्ति पूर्व में निर्धारित वैधानिक प्रक्रियाओं, पात्रता परीक्षाओं और चयन मानदंडों के आधार पर ही हुई थी। अब दोबारा परीक्षा लेने का निर्णय पुरानी चयन प्रक्रिया और व्यवस्था पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। शिक्षकों में इस बात को लेकर भी भय व्याप्त है कि यदि वे इस परीक्षा में सफल नहीं हो पाए तो क्या सरकार उन्हें सेवा से बर्खास्त कर देगी। राष्ट्र निर्माण में कम वेतन पर योगदान देने वाले इन अनुभवी शिक्षकों को प्रोत्साहित करने के बजाय उन पर परीक्षा का दबाव बनाया जा रहा है। मध्य प्रदेश कर्मचारी संघ के प्रमुख सदस्यों जिनमें अटल उपाध्याय, नरेश शुक्ला, प्रशांत सौंधिया, के जी पाठक, दाल चंद पासी, बृजेश मिश्रा, रामदास बरकड़े, हरीश पचौरी, योगेंद्र मिश्रा, राम शंकर शुक्ला, मंसूर वेग, गगन चौबे, राहुल पांडेय, अर्जुन सोमवंशी, सांध्य पाठक, ममता दुबे, रीता खण्डेलवाल, सुनीता घंगोरिया, सुरेन्द्र जायसवाल, रेखा पवार और विनय नामदेव शामिल हैं, उन्होंने इस नीति को निरस्त करने की अपील की है। संघ का कहना है कि सरकार को इस संवेदनशील विषय पर संज्ञान लेते हुए शिक्षकों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करनी चाहिए ताकि उनकी सेवा और गरिमा सुरक्षित रहे।
