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किताबों का नहीं आत्मा का विषय है योग


महाकोशल महाविद्यालय में योग पर वैश्विक मंथन, 18 राज्यों के शोधार्थी हुए शामिल,विशेषज्ञों ने साझा किए विचार

जबलपुर । प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, महाकोशल महाविद्यालय में भारतीय दर्शन और योग के माध्यम से जीवन जीने की कला और अनुशासन पर केंद्रित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। इस आयोजन का मुख्य विषय भारतीय दर्शन और योगः एक शारीरिक और मानसिक अनुशासन रखा गया। आज आयोजित प्रथम तकनीकी सत्र में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर के योग विभागाध्यक्ष डॉ. भरत तिवारी ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। कार्यक्रम में शासकीय महाविद्यालय सीहोर के प्राचार्य डॉ. मोहितास शर्मा और इसी महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. मनोज शर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे। संगोष्ठी की शुरुआत में वक्ताओं ने वर्तमान समय में योग की प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए।

-​योग और भारतीय दर्शन का जीवन में महत्व

​मुख्य अतिथि डॉ. भरत तिवारी ने सत्र को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन और योग को मात्र किताबी ज्ञान समझना उचित नहीं है, बल्कि यह वास्तविकता में जीवन जीने की एक श्रेष्ठ कला है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यदि व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में योग और भारतीय दर्शन के मूलभूत सिद्धांतों को आत्मसात कर ले, तो वह एक स्वस्थ, शांत और संतुलित जीवन व्यतीत करने में सक्षम हो सकता है। उनके अनुसार योग व्यक्ति को आंतरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर सुदृढ़ बनाता है। इसी क्रम में डॉ. मोहितास शर्मा ने प्रतिपादित किया कि योगदर्शन के नियमित अभ्यास से ही शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को मजबूती प्रदान की जा सकती है। उन्होंने स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए योग को अनिवार्य बताया।

​तनाव प्रबंधन और वैश्विक दृष्टिकोण

​विशिष्ट अतिथि डॉ. मनोज शर्मा ने वर्तमान जीवनशैली में बढ़ते मानसिक और शारीरिक तनाव पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बढ़ते तनाव को योग के विभिन्न माध्यमों से प्रभावी रूप से नियंत्रित और ठीक किया जा सकता है। संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में कनाडा से ऑनलाइन माध्यम से जुड़े मुख्य वक्ता श्री अंकित धवन ने अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में योग की महत्ता बताई। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि दर्शन जीवन का सही मार्ग प्रशस्त करने का कार्य करता है और योग उस निर्धारित मार्ग पर निरंतर चलने की शक्ति प्रदान करता है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर योग को दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाने का आह्वान किया ताकि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सके।

-​शोध पत्रों का वाचन,नए चेहरे जुड़े

​संगोष्ठी के समन्वयक प्रो. अरुण शुक्ल ने कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि इस दो दिवसीय आयोजन के प्रति शोधार्थियों में भारी उत्साह देखा गया। उन्होंने जानकारी दी कि दोनों तकनीकी सत्रों के दौरान ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों को मिलाकर देश के 18 राज्यों से लगभग 100 शोध पत्रों का वाचन किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने के लिए लगभग 300 प्रतिभागियों ने अपना पंजीयन कराया था। संगोष्ठी के अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्य डॉ. अलकेश चतुर्वेदी ने कहा कि योग भारतीय संस्कृति द्वारा विश्व को दी गई एक अमूल्य और अद्वितीय धरोहर है। योग का मार्ग व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ बनाने में सहायक सिद्ध होता है।

​समापन सत्र और पतंजलि योग का प्रभाव

​संगोष्ठी के समापन सत्र में शासकीय उत्कृष्ट महाविद्यालय भोपाल के डॉ. वी. एस. राय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योग सूत्र हमें एक अनुशासित और व्यवस्थित जीवन जीने की निरंतर प्रेरणा देते हैं। आज के अत्यधिक तनावपूर्ण, प्रतिस्पर्धी और व्यस्त जीवन में पतंजलि योग की उपयोगिता और अधिक बढ़ गई है। कार्यक्रम के दौरान संगोष्ठी के सफल और सुचारू क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. संघप्रिया तिवारी, डॉ. रविश तमन्ना ताजिर एवं डॉ. जागेश्वर प्रजापति को अतिथियों द्वारा स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस सम्मान के माध्यम से उनके अकादमिक योगदान की सराहना की गई।

​आयोजन समिति और गणमान्य जनों की उपस्थिति

​कार्यक्रम के दौरान मंच का कुशल संचालन डॉ. जागेश्वर प्रजापति द्वारा किया गया। संगोष्ठी के अंत में सभी आगंतुकों और प्रतिभागियों के प्रति आभार प्रदर्शन कार्यक्रम की संयोजक डॉ. ज्योति जुनगरे ने किया। इस गरिमामय आयोजन में डॉ. पवन तिवारी, डॉ. अजय गुप्ता, डॉ. सतीश कुमार, डॉ. सुनील दत्त लखेरा, डॉ. कौशल सिंह गुर्जर, डॉ. मूर्तिदास यादव और डॉ. राजेश शामकुंवर की सक्रिय सहभागिता रही। साथ ही डॉ. रामेश्वर झारिया, डॉ. जयराम सिंह, डॉ. शिवचंद्र वल्के, डॉ. राहुल पटेल, डॉ. विपिन पटेल, डॉ. मानवेन्द्र यादव, डॉ. मनीषा सक्सेना और डॉ. तरुणेन्द्र साकेत सहित महाविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, अतिथि विद्वान, शोधार्थी एवं कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। इस संगोष्ठी ने भारतीय दर्शन के प्रचार-प्रसार में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर स्थापित किया।

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