पश्चिम मध्य रेलवे का मुख्यालय जबलपुर में होने के बावजूद शहर के इन स्टेशनों का नियंत्रण सैकड़ों किलोमीटर दूर से होना यात्रियों और स्थानीय निवासियों के लिए एक बड़ी विसंगति बना हुआ है
जबलपुर। शहर की भौगोलिक सीमा के भीतर स्थित ग्वारीघाट और गढ़ा रेलवे स्टेशनों को स्थानीय रेल मंडल में शामिल करने की मांग ने अब जोर पकड़ लिया है। वर्तमान में इन दोनों महत्वपूर्ण स्टेशनों का संचालन और प्रशासनिक नियंत्रण जबलपुर मंडल के बजाय दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के नागपुर और बिलासपुर मंडलों द्वारा किया जा रहा है। पश्चिम मध्य रेलवे का मुख्यालय जबलपुर में होने के बावजूद शहर के इन स्टेशनों का नियंत्रण सैकड़ों किलोमीटर दूर से होना यात्रियों और स्थानीय निवासियों के लिए एक बड़ी विसंगति बना हुआ है। इस व्यवस्था के कारण छोटे कार्यों के लिए भी बाहरी जोनों पर निर्भरता बनी रहती है।
छोटे-छोटे कामों में बड़ी परेशानी
वर्तमान प्रबंधकीय व्यवस्था के अनुसार ग्वारीघाट और गढ़ा स्टेशनों से जुड़े किसी भी छोटे या बड़े प्रशासनिक निर्णय के लिए अधिकारियों को नागपुर या बिलासपुर स्थित कार्यालयों से अनुमति लेनी पड़ती है। जबलपुर से इन दोनों शहरों की दूरी लगभग 400 किलोमीटर है, जिसके कारण पत्राचार और समन्वय में काफी समय व्यय होता है। यदि इन स्टेशनों का प्रशासनिक प्रभार जबलपुर मंडल को सौंप दिया जाता है तो मुख्य रेलवे स्टेशन से इनकी दूरी घटकर मात्र 10 किलोमीटर से भी कम रह जाएगी। इससे न केवल रेलवे के दैनिक कार्यों में तेजी आएगी बल्कि यात्रियों की शिकायतों का निवारण भी त्वरित गति से संभव हो सकेगा।
रेल प्रोजेक्ट पर भी बुरा असर
केंद्र सरकार ने हाल ही में जबलपुर से गोंदिया रेल लाइन के दोहरीकरण को अपनी औपचारिक स्वीकृति प्रदान की है। यह महत्वपूर्ण रेल परियोजना आगामी 5 वर्षों में पूर्ण होने की संभावना है। इस रेल खंड के विस्तार और दोहरीकरण से उत्तर भारत और दक्षिण भारत के मध्य रेल संपर्क काफी सुदृढ़ होगा। स्थानीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विकास की इस घड़ी में भी ग्वारीघाट और गढ़ा स्टेशन जबलपुर मंडल के अधीन नहीं आते हैं, तो इस पूरे बुनियादी ढांचे के विस्तार और राजस्व का श्रेय स्थानीय मंडल के बजाय नागपुर या बिलासपुर जोन को ही मिलेगा। इससे जबलपुर रेल मंडल के विकास की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं।
सीधी रेल कनेक्टिविटी और वैकल्पिक मार्ग
जबलपुर और नागपुर के बीच वर्तमान में सीधी और तेज रेल सेवा का अभाव यात्रियों के लिए एक स्थायी समस्या बना हुआ है। अभी केवल रीवा–इतवारी एक्सप्रेस ही एक ऐसी नियमित ट्रेन है जो नैनपुर, बालाघाट और गोंदिया के रास्ते नागपुर तक का सफर तय करती है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी उपलब्ध रेलगाड़ियों को इटारसी होकर जाना पड़ता है, जिससे यात्रियों को लंबा चक्कर लगाना पड़ता है और यात्रा समय भी बढ़ जाता है। ग्वारीघाट और गढ़ा स्टेशनों के जबलपुर मंडल में विलय से परिचालन संबंधी बाधाएं दूर होंगी और भविष्य में इस वैकल्पिक मार्ग पर अधिक ट्रेनों के संचालन का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।
जनप्रतिनिधि चाहें तो मुम्किन है
रेलवे से जुड़े जानकारों का स्पष्ट मत है कि इन स्टेशनों को स्थानीय मंडल में सम्मिलित करने के लिए रेलवे बोर्ड को एक व्यवस्थित तकनीकी प्रस्ताव भेजने की आवश्यकता है। इसमें स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी और राजनैतिक पहल अनिवार्य मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार इन स्टेशनों के पूर्णतः विकसित होने और स्थानीय नियंत्रण में आने से जबलपुर के मुख्य रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का अतिरिक्त दबाव कम होगा। इससे न केवल रेल परिचालन में सुधार होगा बल्कि शहर के सुदूर क्षेत्रों के यात्रियों को आधुनिक रेल सुविधाएं उनके घर के समीप ही उपलब्ध हो सकेंगी।
