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29 जिलों की अदालतों में बाउंड्री वॉल तक नहीं: जजों की सुरक्षा पर हाई कोर्ट ने मांगी 31 मार्च तक रिपोर्ट




जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने प्रदेश की अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार के प्रति कड़ी नाराजगी जाहिर की है। मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रदेश के न्यायिक परिसरों में सुरक्षा के हालात चिंताजनक हैं। कहीं अदालत की दीवार गिरने से न्यायाधीश चोटिल हो रहे हैं तो कहीं परिसर के भीतर बम धमाकों जैसी घटनाएं हो रही हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर शासन गंभीर क्यों नहीं है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश सरकार को 31 मार्च तक सुरक्षा व्यवस्था पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इस मामले में हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से अधिवक्ता बीएन मिश्रा ने अपना पक्ष रखा। न्यायाधीशों के संगठन जजेस एसोसिएशन की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता केसी घिल्डियाल उपस्थित हुए। वहीं राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता अनुभव जैन ने पक्ष रखा।

​न्यायिक परिसरों की सुरक्षा पर सरकार को कड़ा अल्टीमेटम

​सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने हालिया घटनाओं का उल्लेख करते हुए सुरक्षा में सेंधमारी पर चिंता जताई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों के भीतर होने वाली हिंसक घटनाएं और बुनियादी ढांचे की कमजोरी सीधे तौर पर न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। जजों की सुरक्षा केवल व्यक्तिगत विषय नहीं है बल्कि यह न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है। सरकार को आदेश दिया गया है कि वह प्रदेश की सभी अदालतों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम सुनिश्चित करे। 31 मार्च की समय सीमा तय करते हुए कोर्ट ने रिपोर्ट में हर जिले की वर्तमान स्थिति और किए गए सुधारों का पूरा ब्यौरा मांगा है। प्रशासन को यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कार्ययोजना तैयार की गई है।

​प्रशासनिक रिपोर्ट में सुरक्षा खामियों का बड़ा खुलासा

​हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार नरेश एम. सिंह द्वारा पेश की गई रिपोर्ट ने प्रदेश की अदालतों की सुरक्षा की पोल खोलकर रख दी है। रिपोर्ट के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश के 29 जिला न्यायालयों में अब तक चहारदीवारी का निर्माण नहीं हुआ है। इसके अलावा 27 तहसील न्यायालय ऐसे पाए गए हैं जहां बाउंड्री वॉल की ऊंचाई बहुत कम है जिससे कोई भी बाहरी व्यक्ति आसानी से प्रवेश कर सकता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पूरे प्रदेश के केवल 5 जिला अदालत परिसरों में ही पुलिस चौकी स्थापित है। अन्य जिलों में सुरक्षा के नाम पर पर्याप्त पुलिस बल तैनात नहीं है। सीसीटीवी कैमरों की कमी और प्रवेश द्वारों पर जांच की व्यवस्था न होना भी बड़ी खामी के रूप में सामने आया है।

​न्यायाधीशों और उनके परिजनों की सुरक्षा पर गहराता संकट

​सुरक्षा का मुद्दा केवल अदालत परिसर तक सीमित नहीं है। रजिस्ट्रार की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि प्रदेश के 28 जिलों में न्यायाधीश और उनके परिवारों की सुरक्षा व्यवस्था भी नाकाफी है। जजों के आवासीय परिसरों में सुरक्षा गार्डों की कमी और वहां की बाउंड्री वॉल की स्थिति असुरक्षित पाई गई है। हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जब न्यायाधीश ही भयमुक्त वातावरण में नहीं रहेंगे तो न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है। गौरतलब है कि जजों की सुरक्षा को लेकर हाई कोर्ट ने वर्ष 2016 में स्वतः संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू की थी। पिछले 10 वर्षों से यह मामला लंबित है और समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर स्थितियां नहीं बदली हैं।

​सरकारी दावों और धरातल की हकीकत के बीच विरोधाभास

​राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता अनुभव जैन ने अदालत को बताया कि शासन द्वारा सुरक्षा सुधार के कार्य किए जा रहे हैं। सरकार ने दलील दी कि जिन अदालतों में बाउंड्री वॉल नहीं थी वहां निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया गया है और जहां दीवारें छोटी थीं उनकी ऊंचाई बढ़ाई जा रही है। हालांकि अदालत सरकार के इन जवाबों से संतुष्ट नजर नहीं आई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि कार्य हो रहे हैं तो फिर दीवार गिरने और बम फटने जैसी घटनाएं क्यों हो रही हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बजट का सही आवंटन हो और सुरक्षा उपकरणों की खरीद के साथ-साथ पुलिस बल की तैनाती में कोई कोताही न बरती जाए। अब सबकी नजरें 31 मार्च को पेश होने वाली अगली रिपोर्ट पर टिकी हैं।

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