2.45 करोड़ के समायोजन में फाइल अप्रूवल करने वाले अफसरों की भूमिका पर उठे सवाल,छिंदवाड़ा की कम्पनियों से जुड़ रहे तार
जबलपुर। मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी में वित्तीय अनियमितता का एक बड़ा मामला सामने आया है। इसमें 2.45 करोड़ रुपये के बिल समायोजन में बरती गई लापरवाही के चलते विभाग के भीतर हड़कंप मचा हुआ है। कंपनी प्रबंधन ने इस पूरे प्रकरण में मुख्य रूप से लेखाधिकारी को जिम्मेदार ठहराते हुए निलंबन की कार्रवाई की है, लेकिन अब इस फाइल को मंजूरी देने वाले उच्च स्तर के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। यह विवाद छिंदवाड़ा की दो बड़ी फर्मों के बिजली बिलों में दी गई राहत और उसके क्रियान्वयन से जुड़ा हुआ है।
प्रकरण में अब तक क्या हुआ
विद्युत वितरण कंपनी ने इस वित्तीय हेरफेर के लिए लेखाधिकारी दिग्विजय सिंह चौहान को प्रथम दृष्टया दोषी माना है। उन पर आरोप है कि 2.45 करोड़ रुपये की विशाल राशि का समायोजन करते समय निर्धारित नियमों और विभागीय प्रक्रियाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। प्रबंधन की जांच रिपोर्ट के आधार पर उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। हालांकि, निलंबित अधिकारी की ओर से इन आरोपों को लेकर अपनी सफाई पेश की गई है। उनका तर्क है कि इतनी बड़ी राशि का समायोजन किसी एक अकेले अधिकारी के स्तर पर संभव नहीं है और इसमें फाइल को आगे बढ़ाने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की भी समान जवाबदेही बनती है।
छिंदवाड़ा की वो दो फर्में कौन सी हैं
यह पूरा मामला साल 2023 का है, जो मेसर्स आरसीएल छिंदवाड़ा और मेसर्स जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड से संबंधित है। इन दोनों फर्मों ने बिजली ड्यूटी की दरों को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी थी। पूर्व में इनसे 40 प्रतिशत की दर से इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी ली जा रही थी, जिसे 15 प्रतिशत करवाने के लिए कंपनियों ने न्यायालय में अपील दायर की थी। न्यायालय ने फर्मों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया था कि अतिरिक्त ली गई राशि का समायोजन आगामी बिजली बिलों में 24 बराबर किस्तों के माध्यम से किया जाए। इसी अदालती आदेश के पालन के दौरान नियमों के उल्लंघन की बात सामने आई है।
जरूरी अनुमति के बिना कैसे मिली छूट
जांच के दौरान सबसे गंभीर तथ्य यह निकलकर आया है कि बिजली बिलों में ड्यूटी की छूट देने के लिए अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। नियमानुसार, जिस ड्यूटी में राहत दी जानी थी, उसके लिए विद्युत सुरक्षा विभाग से विधिवत अनुमति लेना आवश्यक था। बिना इस विभाग की क्लीयरेंस के ही बिलों में कटौती और समायोजन की प्रक्रिया को अंजाम दे दिया गया। कंपनी के आंतरिक सूत्रों का कहना है कि इस स्तर की छूट के लिए प्रबंध संचालक स्तर तक की मंजूरी की आवश्यकता होती है, लेकिन यहां प्रक्रियात्मक खामियां छोड़ी गईं, जिससे कंपनी को करोड़ों रुपये का वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।
जांच के घेरे में कई बड़े अधिकारी
भले ही वर्तमान में केवल लेखाधिकारी पर कार्रवाई की गई है, लेकिन जांच का दायरा अब बढ़ता जा रहा है। मामले में यह सवाल प्रमुखता से उठाया जा रहा है कि जब एडजस्टमेंट के बिल लगाए गए थे, तो उन पर अंतिम मोहर लगाने वाले अधिकारियों ने इन तकनीकी खामियों को क्यों नहीं पकड़ा। पूर्व में भी इस प्रकरण में चार्जशीट जारी की गई थी, जिस पर संबंधित अधिकारी को न्यायालय से राहत मिल गई थी। अब नए प्रबंध संचालक के निर्देश पर दोबारा हुई जांच में नए सिरे से तथ्यों को खंगाला जा रहा है। विभाग के भीतर चर्चा है कि फाइल अप्रूवल की चेन में शामिल अन्य लोगों की भूमिका भी संदिग्ध है।
बड़े अधिकारी की जांच होगी या नहीं
कंपनी के नियमों के मुताबिक बिजली बिलों के भुगतान और समायोजन की अंतिम जिम्मेदारी लेखा विभाग की होती है। इसी नियम का हवाला देते हुए वर्तमान में कार्रवाई को सही ठहराया जा रहा है। हालांकि, पीड़ित पक्ष और विभाग के अन्य कर्मचारी संगठन इस बात पर जोर दे रहे हैं कि केवल निचले स्तर के कर्मियों को बलि का बकरा न बनाया जाए। पूरे मामले में मुख्य महाप्रबंधक कार्यालय से भी स्पष्टीकरण लेने का प्रयास किया गया है ताकि यह साफ हो सके कि भविष्य में इस तरह की गड़बड़ियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। फिलहाल विभाग के कई अन्य रसूखदार अधिकारी भी इस जांच की तपिश महसूस कर रहे हैं।
