जबलपुर। ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश शासन को महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि महाधिवक्ता कार्यालय में शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्तियों के दौरान ओबीसी, एससी, एसटी तथा महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। यह आदेश सामाजिक न्याय और संवैधानिक प्रावधानों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने माना त्रुटिपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और डिवीजन बेंच द्वारा पूर्व में दिए गए आदेशों को त्रुटिपूर्ण करार दिया है। इससे पहले हाईकोर्ट ने एसोसिएशन की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि सरकारी वकील का पद 'लोक सेवक' की श्रेणी में नहीं आता है, इसलिए इसमें आरक्षण या विशेष प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को दरकिनार करते हुए संवैधानिक मूल्यों के आधार पर नियुक्तियों में विविधता और प्रतिनिधित्व को अनिवार्य माना है।
वर्ष 2022 से जारी कानूनी लड़ाई में मिली सफलता
ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने वर्ष 2022 में हाईकोर्ट के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। दिनांक 10 फरवरी 2025 को जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश तथा जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ के समक्ष सीरियल नंबर 11 पर इस मामले की सुनवाई हुई। इस महत्वपूर्ण प्रकरण में एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, वरुण ठाकुर एवं विनायक प्रसाद ने प्रभावी ढंग से पक्ष रखा और नियुक्तियों में संवैधानिक प्रावधानों के पालन की वकालत की।
