जब तस्वीरों को भी महसूस हुआ कि अब उन्हें बोलना होगा...देखें वीडियो


कैनवास पर उतरा शैलपर्ण का नैसर्गिक वैभव: तूलिकाओं ने उकेरी प्रकृति की जीवंत छवि

जबलपुर। संस्कारधानी की कलात्मक विरासत को सहेजते हुए 'जबलपुर स्केचिंग क्लब' के तत्वावधान में आज शैलपर्ण उद्यान की वादियों में रंगों का अनूठा संगम देखने को मिला। प्रकृति के सानिध्य में जुटे शहर के प्रबुद्ध चित्रकारों ने अपनी तूलिकाओं के माध्यम से शैलपर्ण की चट्टानों, वनस्पति और यहाँ के शांत वातावरण को कैनवास पर जीवंत कर दिया। जहाँ कुछ कलाकारों ने विशाल कैनवास पर अपनी कल्पनाएँ उकेरीं, वहीं कुछ ने पेपर पर वॉटर कलर के माध्यम से प्रकृति की पारदर्शिता को दर्शाया। ​इस कला शिविर में अवधेश बाजपेई, ब्रज मोहन आर्य, कामना जायसवाल, आयुष पुरी गोस्वामी, कपिल जाटव, प्रियंका लोधी, अनुराग ठाकुर एवं मुकेश विश्वकर्मा जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अपनी सहभागिता दर्ज की।

दूधराज की चपलता और शैलपर्ण का स्थापत्य



उद्यान की देखरेख करने वाले संजय सिन्हा और सुधीश साहू ने कलाकारों को यहाँ के अनूठे पक्षी संसार से परिचित कराया। विशेष रूप से मध्य प्रदेश के राजकीय पक्षी दूधराज की उपस्थिति ने कलाकारों को रोमांचित किया। लंबी सफेद पूंछ और सिर पर कलगी वाले इस आकर्षक पक्षी के साथ-साथ इसके कत्थई स्वरूप को भी कलाकारों ने अपनी कला का मुख्य केंद्र बनाया। इसके अतिरिक्त, जबलपुर की पहचान 'बैलेंसिंग रॉक' और यहाँ की प्राचीन शिलाओं को कलाकारों ने बड़ी ही सूक्ष्मता के साथ चित्रित किया।

कला और संवाद का सुरीला संगम


शैलपर्ण की सैर पर आए सैलानियों के लिए यह दृश्य किसी उत्सव से कम नहीं था। चित्रकारों को सजीव चित्रण करते देख बड़ी संख्या में लोग वहाँ ठिठक गए। कलाकारों और सैलानियों के बीच प्रकृति के भौगोलिक स्वरूप और कला की बारीकियों को लेकर गहरा संवाद हुआ। सैलानियों ने न केवल पेंटिंग बनाने की प्रक्रिया को सराहा, बल्कि विषयों के चयन को लेकर भी कलाकारों से अपनी जिज्ञासाएं साझा कीं।

स्वच्छता का संदेश और सामाजिक सरोकार


कलाकारों ने केवल रंगों से ही नहीं, बल्कि अपने आचरण से भी समाज को प्रेरित किया। चित्रकारों ने अपने सामाजिक सरोकार को निभाते हुए उद्यान परिसर में बिखरे कचरे को साफ किया। कलाकारों ने वहां उपस्थित पर्यटकों से विनम्र आग्रह किया कि इस प्राकृतिक धरोहर की सुंदरता को बनाए रखने के लिए स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। यह आयोजन न केवल कला की दृष्टि से बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक सार्थक कदम साबित हुआ।

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