अलविदा ज्ञानरंजन...! साहित्य के 'पिता' और 'पहल' के सारथी का अवसान: जबलपुर ने खोया अपना अनमोल रत्न


हिन्दी साहित्य के एक युग का समापन : 
90 वर्ष की आयु में अंतिम विदा

जबलपुर। हिन्दी साहित्य जगत के लिए आज का दिन एक गहरी रिक्तता लेकर आया है। 'साठोत्तरी' पीढ़ी के सबसे प्रखर हस्ताक्षर, कालजयी कथाकार और 'पहल' पत्रिका के यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन का बुधवार रात 10:30 बजे जबलपुर में निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। बुधवार सुबह स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से भारतीय साहित्य में प्रगतिकामी चेतना का एक सशक्त स्वर शांत हो गया है। 

इलाहाबाद से जबलपुर तक: एक शैक्षणिक और साहित्यिक सफर

​21 नवंबर, 1936 को महाराष्ट्र के अकोला में जन्मे ज्ञानरंजन का बचपन देश के विभिन्न हिस्सों में बीता। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा साहित्य के गढ़ इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद वे जबलपुर आ गए और यहाँ के जीएस कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। 1996 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे साहित्य के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे। उनकी पहचान एक ऐसे शिक्षक और लेखक की थी, जिसने नई पीढ़ी को न केवल साहित्य पढ़ना सिखाया, बल्कि उसे समाज से जोड़ना भी सिखाया।

'पहल' के माध्यम से वैचारिक क्रांति और अमर कथा-साहित्य

​ज्ञानरंजन जी ने लगभग 35 वर्षों तक 'पहल' पत्रिका का संपादन किया। यह महज एक पत्रिका नहीं, बल्कि हिन्दी साहित्य का एक जीवंत संस्थान थी। आपातकाल के कठिन दौर में भी 'पहल' ने वैचारिक स्वतंत्रता और प्रतिरोध की मशाल जलाए रखी। एक कथाकार के रूप में उन्होंने 'फेन्स के इधर और उधर', 'क्षणजीवी' और 'सपना नहीं' जैसे संग्रहों से हिन्दी कहानी को नई दिशा दी। उनकी कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्विरोधों और मानवीय रिश्तों की टूट-फूट का जो तीखा विश्लेषण मिलता है, वह विरल है। उनकी गद्य रचना 'कबाड़खाना' आज भी पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

सम्मानों से अलंकृत और उनका व्यापक प्रभाव

​उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 'सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड', 'साहित्य भूषण', 'शिखर सम्मान' और 'मैथिलीशरण गुप्त सम्मान' जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया। भारतीय दूरदर्शन ने उनके जीवन पर एक विशेष फिल्म भी तैयार की थी। उनकी रचनाओं की गहराई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी कहानियों पर फिल्मों का निर्माण भी हुआ। ज्ञानरंजन जी का जाना न केवल एक व्यक्ति का जाना है, बल्कि हिन्दी गद्य के उस अध्याय का समापन है जिसने प्रतिरोध और प्रगतिशीलता को अपनी पहचान बनाया।

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