88% 'अवैध' संपत्ति घटकर रह गई सिर्फ 2%: हाई कोर्ट ने पलटा लोकायुक्त का केस


जबलपुर।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की युगलपीठ ने स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसियां पति की संपत्ति का आकलन करते समय उसमें पत्नी की व्यक्तिगत कमाई को शामिल नहीं कर सकती हैं। कोर्ट ने रीवा के आबकारी डिप्टी कमिश्नर आलोक खरे और उनकी पत्नी मीनाक्षी खरे के विरुद्ध चल रही अभियोजन की कार्यवाही को निरस्त कर दिया है।

लोकायुक्त की कार्रवाई और गलत असेसमेंट

​वर्ष 2018 में लोकायुक्त ने आबकारी विभाग के डिप्टी कमिश्नर आलोक खरे के ठिकानों पर छापेमारी की थी। लोकायुक्त ने अपनी जांच रिपोर्ट में दावा किया था कि दंपति के पास 10.71 करोड़ की संपत्ति है, जबकि उनकी वैध आय केवल 5.69 करोड़ है। इस आधार पर इसे आय से 88.20% अधिक संपत्ति मानकर भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया गया था और सरकार ने अभियोजन की मंजूरी दे दी थी।

 पत्नी की स्वतंत्र आय को किया गया नजरअंदाज

​आलोक खरे की पत्नी मीनाक्षी खरे पेशे से अधिवक्ता हैं। याचिका में बताया गया कि वह शादी के पहले से ही इनकम टैक्स रिटर्न फाइल कर रही हैं। लोकायुक्त ने उनकी व्यक्तिगत वकालत की आय और उनकी खेती की जमीन से हुई 4.81 करोड़ की कमाई को जांच में शामिल नहीं किया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यदि इस आय को जोड़ा जाए तो कुल वैध आय 10.50 करोड़ होती है, जो संपत्ति के लगभग बराबर है।

 'आय के ज्ञात स्रोत' पर हाई कोर्ट की व्याख्या

​हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि आय के ज्ञात स्रोत का मतलब ऐसी कमाई से है जो कानूनी रूप से टैक्स फाइलिंग और नियमों के तहत अर्जित की गई हो। कोर्ट ने कहा कि जो महिला वकील शादी से पहले से टैक्स दे रही है और कृषि आय प्राप्त कर रही है, उसकी संपत्ति को पति की 'अवैध संपत्ति' के खाते में नहीं डाला जा सकता।

 अभियोजन की मंजूरी और कानूनी कार्यवाही की निरस्त

​कोर्ट ने पाया कि यदि पत्नी की वैध आय को जोड़ लिया जाए, तो संपत्ति और आय के बीच अंतर मात्र 2% रह जाता है। नियमानुसार, यदि अंतर 10% से कम हो, तो भ्रष्टाचार का मामला नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सक्षम प्राधिकारी को मंजूरी देने से पहले इन तथ्यों को देखना चाहिए था। इसी के साथ हाई कोर्ट ने अभियोजन स्वीकृति के आदेश और आगे की पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

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