जबलपुर. शायद ये जानकारी बहुत कम लोगों को होगी कि जब मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कार्पोरेशन (एमपीएमआरसीएल) का गठन हुआ था तो वह प्रदेश के चार बड़े शहरों इंदौर, भोपाल, जबलपुर व ग्वालियर को ध्यान में रखकर किया गया था. किंतु दो शहरों इंदौर और भोपाल ने इसमें बाजी मार ली और बाद में उज्जैन का नाम और जुड़ा, जिसका भी काम शुरू हो चुका है, किंतु मेट्रो संस्कारधनी जबलपुर के लिए फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आ रही है. जानकारों की माने तो आज इसके लिए प्रयास करें तो अगले 7 सालों बाद ही इसका लाभ शहरवासियों को मिल सकेगा.
वर्तमान में जिस प्रकार जबलपुर में सड़कों पर वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है. शहर की शायद ही कोई सड़क होगी, जिसमें लोग जाम में नहीं फंसते होंगे. ऐसे में लोगों के मन में भी इंदौर, भोपाल की तर्ज पर जबलपुर में भी तीव्र, सुरक्षित परिवहन मेट्रो रेल की इच्छा हो रही है. लेकिन यह हो कैसे, इस दिशा में जिम्मेदारों द्वारा फिलहाल किसी तरह के प्रयास करने की जानकारी सामने नहीं आ रही है.
एमपीएमआरसीएल गठन के समय जबलपुर का भी नाम
सूत्रों के मुताबिक प्रदेश के लिए किफायती, प्रदूषण रहित, तीव्र परिवहन की सुविधा की परिकल्पना करते हुए जब एमपीएमआरसीएल का गठन किया गया था, तब जबलपुर का नाम भी इसमें प्रमुखता से था, किंतु इस सुविधा के लिए जबलपुर लगातार पिछड़ता जा रहा है. बाद में नया शहर उज्जैन का नाम जुड़ा, जिसका काम भी शुरू हो रहा है.
आज करें प्रयास, 7 साल बाद मिल सकेगी सुविधा
मेट्रो रेल सेवा के जानकारों का मानना है कि यदि आज जबलपुर में मेट्रो के कार्य का प्रस्ताव तैयार होता है तो इसे पूर्ण रूप लेने में कम से कम 7 साल तो लगेंगे ही. शुरुआत दो से तीन साल तक तो रूट का सर्वे, जमीन की मजबूती की जांच, ड्राइंग, डिजाइन बनाना होता है, उसके बाद टेंडर आदि का काम होता है. फिर जमीन पर काम शुरु होता है, जिसमें भी काफी धीमी गति से काम किया जाता है. मेन काम में ही 4 साल कम से कम लगता है, यानी पूरा प्रोजेक्ट प्रस्ताव मिलने के बाद 7 साल का समय लगता ही है.
फंड समस्या नहीं, इच्छाशक्ति की कमी
सूत्रों के मुताबिक जबलपुर में मेट्रो रेल के लिए फंड कोई समस्या नहीं है, समस्या सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति की सामने आ रही है, यदि यहां के जनप्रतिनिधि इस दिशा में आज प्रयास करें तो संस्कारधानीवासियों को 2033-34 में इसका लाभ मिलेगा. जहां तक फंड की बात है तो 20 प्रतिशत राशि राज्य शासन, 20 फीसदी राशि केंद्र सरकार वहन करती है, शेष 60 फीसदी राशि लोन पर मिलती है.
जनसंख्या क्रायटेरिया नहीं, वाहनों की संख्या भी महत्वपूर्ण
जानकारों का मानना है कि किसी शहर में मेट्रो रेल के लिए एक निश्चित जनसंख्या होना चाहिए, ये बात सही नहीं है, जनसंख्या के साथ-साथ वाहनों की संख्या में भी महत्वपूर्ण है. जबलपुर में जिस प्रकार लगातार सड़कों पर वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है, हर सड़क, क्षेत्र में जाम की स्थिति बन रही है. ऐसे में इसका एक ही हल है कि यहां पर भी मेट्रो रेल के प्रयास किये जाएं.

