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मप्र प्रमोशन नियम 2025 के दो नियम 'असंवैधानिक', हाई कोर्ट में याचिका दायर


जबलपुर |
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा नौ साल के लंबे इंतजार के बाद लागू किए गए नए पदोन्नति नियमों पर फिर से कानूनी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। सिवनी निवासी ज्वाइंट डायरेक्टर सुरेश कुमरे की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। याचिका में नियमों की विसंगतियों को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के विरुद्ध बताया गया है।

रूल 11 पर विवाद: आरक्षित वर्ग के मेधावी कर्मचारी होंगे प्रभावित

​वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने दलील दी कि पदोन्नति नियम 2025 का रूल 11 पूरी तरह से असंवैधानिक है। इस नियम में व्यवस्था दी गई है कि प्रमोशन के लिए पहले आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की सूची तैयार की जाएगी और उसके बाद अनारक्षित वर्ग की। अधिवक्ता ठाकुर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि पहले अनारक्षित वर्ग के लिए डीपीसी की जानी चाहिए, जिसमें सभी वर्गों के मेरिटोरियस कर्मचारियों को योग्यता और अनुभव के आधार पर शामिल किया जाए। मप्र सरकार का नया नियम आरक्षित वर्ग के मेधावी उम्मीदवारों को मेरिट के आधार पर अनारक्षित पदों पर पदोन्नति पाने से रोकता है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

डीपीसी के विचार क्षेत्र पर भी आपत्ति

​याचिका में दूसरे बड़े बिंदु पर आपत्ति जताते हुए कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के निर्देशों में स्पष्ट किया है कि एक पद के विरुद्ध 5 गुना अभ्यर्थियों को डीपीसी प्रक्रिया में शामिल किया जाए। केंद्र सरकार और अन्य राज्यों ने इसे अपनाया है, लेकिन मध्यप्रदेश के नए नियमों में केवल 3 गुना अभ्यर्थियों को शामिल करने का प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इससे पात्र और योग्य कर्मचारियों के चयन के अवसर सीमित हो जाते हैं।

कोर्ट की अगली सुनवाई पर नजर

​याचिकाकर्ता सुरेश कुमरे ने पूर्व में इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी, जहां से उन्हें हाई कोर्ट जाने की सलाह दी गई थी। याचिकाकर्ता ने 27 नवंबर 2025 को राज्य शासन को अभ्यावेदन देकर इन नियमों में सुधार की मांग की थी, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर हाई कोर्ट की शरण ली। अब 13 जनवरी को होने वाली सुनवाई पर प्रदेश के लाखों कर्मचारियों की नजर टिकी है।

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