मप्र महाधिवक्ता कार्यालय की नियुक्तियों पर 'अंधेरगर्दी' का आरोप, हाईकोर्ट में 157 वकीलों की लिस्ट चैलेंज


संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन, मामला अब हाईकोर्ट की चौखट पर

जबलपुर। मध्यप्रदेश में 157 सरकारी वकीलों की नियुक्ति का मामला अब कानूनी गलियारों से निकलकर अदालत की दहलीज पर खड़ा हो गया है। 25 दिसंबर को जारी हुई नियुक्ति सूची के खिलाफ जबलपुर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नियुक्तियों में योग्यता  की जगह पसंद को तरजीह दी गई है, जिससे राज्य सरकार और महाधिवक्ता कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

नियम ताक पर: 2013 की अधिसूचना के उल्लंघन का दावा

​जबलपुर निवासी अधिवक्ता योगेश सोनी द्वारा दायर इस याचिका में सीधे तौर पर चयन प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्ष 2013 की राजपत्र अधिसूचना के तहत सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए जो कड़े नियम और मानक तय किए गए थे, उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। याचिका के अनुसार, महाधिवक्ता कार्यालय ने आवेदन तो मंगवाए, लेकिन उम्मीदवारों के मूल्यांकन का कोई पैमाना सार्वजनिक नहीं किया। याचिका में आरोप है कि चयन समिति ने न तो कोई अंक प्रणाली अपनाई और न ही योग्य अधिवक्ताओं को रिजेक्ट करने का कोई ठोस कारण बताया। यह पूरी प्रक्रिया "पिक एंड चूज" की नीति पर आधारित प्रतीत होती है, जो प्रशासनिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

अनुच्छेद 14 और 16 का हवाला: अनुभव बना ढाल, दक्षता बेहाल

​याचिका में सबसे कड़ा प्रहार चयन के आधार पर किया गया है। तर्क दिया गया है कि केवल प्रैक्टिस के वर्षों को ही एकमात्र पैमाना मान लेना असंवैधानिक है। सरकारी वकील का पद अत्यंत जिम्मेदारी का होता है, जहाँ योग्यता, ईमानदारी और कानूनी समझ सर्वोपरि होनी चाहिए। याचिका में कहा गया है कि मनमाने तरीके से किए गए इस चयन ने कई योग्य और मेधावी वकीलों के अवसरों को छीन लिया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है। अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट पर टिकी हैं। यदि अदालत इन आरोपों को गंभीरता से लेती है, तो महाधिवक्ता कार्यालय को पूरी चयन प्रक्रिया का ब्यौरा और रिकॉर्ड पेश करना पड़ सकता है।

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