खंडपीठ ने आरोप रद्द करने से किया इंकार, ट्रायल जारी रहेगा, भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप कायम, हाई कोर्ट ने याचिकाएँ खारिज कीं
जबलपुर। इंदौर के चर्चित मास्टर प्लान परिवर्तन घोटाले में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी यू.एस. कामल, डी.पी. तिवारी, बिल्डर मनीष कालानी और नगर निगम के पूर्व भवन अधिकारी राकेश शर्मा को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। सभी ने उनके विरुद्ध ट्रायल कोर्ट द्वारा तय किए गए आरोपों को चुनौती दी थी, परंतु हाई कोर्ट की जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस राजकुमार चौबे की खंडपीठ ने हस्तक्षेप से इंकार करते हुए सभी याचिकाएँ निरस्त कर दीं।यह मामला वर्तमान में इंदौर की ट्रायल कोर्ट में विचाराधीन है, जहाँ आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, धोखाधड़ी (आईपीसी 420) और आपराधिक षड्यंत्र के गंभीर आरोप तय किए जा चुके हैं। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि आरोपों पर आगे बढ़ने से पहले अभियोजन स्वीकृति ली जाना आवश्यक था। इस पर खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन स्वीकृति का प्रश्न ट्रायल की अंतिम अवस्था में तय किया जाना अधिक उचित होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने की प्रक्रिया में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और यह पूरी तरह उपलब्ध प्रमाणों पर आधारित है।
रिहायशी जमीन को व्यावसायिक दिखाकर लाभ दिलाने का आरोप
मामला उस आरोप से जुड़ा हुआ है जिसमें कहा गया कि मास्टर प्लान में जानबूझकर रिहायशी क्षेत्र को व्यावसायिक घोषित किया गया, जिससे निजी बिल्डर को करोड़ों का लाभ मिलने की संभावना बनी। ईओडब्ल्यू की जांच रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया कि मास्टर प्लान में बदलाव नियमों के विरुद्ध और लाभ विशेष हेतु किए गए थे। इसी रिपोर्ट के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं धोखाधड़ी के आरोप तय किए थे। हाई कोर्ट ने कहा कि आरोप उस साक्ष्य पर आधारित हैं जो अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं, इसलिए आरोप तय करना “पूरी तरह विधिसंगत” है।खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बादल बनाम पंजाब राज्य के महत्वपूर्ण फैसले का उल्लेख भी किया, जिसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की तकनीकी ढील या नरमी न्यायहित में नहीं मानी जा सकती।अदालत ने माना कि प्रस्तुत मामला गंभीर आर्थिक अनियमितताओं, सत्ता के दुरुपयोग और सार्वजनिक हित को नुकसान पहुँचाने के आरोपों से जुड़ा है, इसलिए ट्रायल कोर्ट में मुकदमे को आगे बढ़ने दिया जाना उचित है। हाई कोर्ट के इस निर्णय के बाद अब सभी आरोपी ट्रायल का सामना करेंगे। निर्णय ने राज्य प्रशासन, शहरी नियोजन प्रणाली और बिल्डर–प्रशासन गठजोड़ से जुड़े कई सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है।
