जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि जिस विवाह में प्रेम और विश्वास पूरी तरह समाप्त हो चुका हो और केवल नफरत व क्रूरता बची हो, उसे जबरन खींचना दोनों पक्षों के साथ अन्याय है। जस्टिस विशाल धगत और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने एक प्रेम विवाह के 23 साल बाद उसे कानूनी रूप से समाप्त करने का आदेश दिया है।
एक ही मकान में अलग रह रहे पति-पत्नी
मामला अनूपपुर के शैलेंद्र और श्वेता (नाम परिवर्तित) का है, जिन्होंने जून 2001 में प्रेम विवाह किया था। हालांकि, शादी के कुछ ही समय बाद उनके रिश्तों में कड़वाहट आ गई। साल 2011 से दोनों एक ही मकान में अलग-अलग मंजिलों पर रह रहे थे, लेकिन उनके बीच भावनात्मक संबंध पूरी तरह खत्म हो चुके थे। निचली अदालत द्वारा तलाक की अर्जी खारिज होने के बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर अनैतिक संबंधों के आरोप लगाए और मर्यादित सीमाओं को लांघा। बेंच ने स्पष्ट किया कि जब पति-पत्नी के बीच एक दशक से अधिक समय से कोई संवाद या वापसी की संभावना न बची हो, तो ऐसे 'मृत' विवाह को कागजों पर जीवित रखना समाज और व्यक्ति दोनों के लिए घातक है। अदालत ने मानवीय पक्ष को प्राथमिकता देते हुए कहा कि कानून को केवल तकनीकी पहलुओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसी के साथ, कोर्ट ने कोतमा जिला अदालत के फैसले को पलटते हुए शादी को शून्य घोषित कर दिया।
