सतना। विजयदशमी पर जहां देशभर में रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है, वहीं सतना जिले के कोठी कस्बे की परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां दशकों से रावण का दहन नहीं बल्कि उसका पूजन होता है। ढोल-नगाड़ों के साथ लंकेश की प्रतिमा के सामने श्रद्धालु एकत्र होकर जयकारे लगाते हैं और विधिविधान से पूजा अर्चना करते हैं।
क्यों है रावण की पूजा?
पुजारी के मुताबिक, रावण केवल लंकेश नहीं थे, बल्कि महाज्ञानी और महान पंडित थे। उनका मानना है कि रावण ने वेद-पुराणों की व्याख्या की और भगवान शिव की स्तुति में अनगिनत कृतियां लिखीं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी उन्होंने साधना से प्रसन्न किया। इसलिए एक भूल के आधार पर उनकी विद्वता और तपस्या को नकारा नहीं जा सकता। यहां के लोग उन्हें अपना वंशज और रिश्तेदार मानकर पूजते हैं।
आस्था के साथ मान्यता
15 साल पहले नए थाना भवन का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। उसी समय पुजारी को स्वप्न आया कि रावण की प्रतिमा को क्षति पहुंच रही है। जब जेसीबी मशीन ने प्रतिमा पर प्रहार किया, तो वहां से सांप निकलने की घटना सामने आई। मजदूरों में भगदड़ मच गई और निर्माण स्थल बदलना पड़ा। इसके बाद से यहां रावण प्रतिमा की पूजा और भी आस्था के साथ की जाने लगी।
पुजारी मिश्रा का कहना है कि भगवान ब्रह्मा ने चार वेद और छह पुराणों के वर्णन के लिए रावण को चुना था। उनके अनुसार इस धरती, आकाश और पाताल में उनसे बड़ा विद्वान कोई नहीं था। यही कारण है कि कोठी कस्बे के लोग दशहरे पर रावण दहन नहीं करते, बल्कि उन्हें स्मरण कर सम्मान देते हैं।
