बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के मामले में फैसला, दैनिक वेतन भोगी कर्मी की याचिका स्वीकार
जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सेवा मामलों से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रकरण में कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने बरकतउल्ला विश्वविद्यालय प्रशासन को कड़े निर्देश दिए हैं कि जब संस्थान में कार्यरत कनिष्ठ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को नियमित किया जा चुका है, तो उनसे वरिष्ठ दैनिक वेतन भोगी कर्मी को भी उसी दिन से नियमितीकरण का पूरा लाभ दिया जाए। हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय की इस कार्रवाई को समानता के सिद्धांत के विपरीत माना है। यह आदेश मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल धगट की एकल पीठ द्वारा भोपाल निवासी दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी शैलेश तांबेकर की याचिका पर विस्तृत सुनवाई के बाद पारित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अजय रायजादा ने अदालत के सामने तथ्य रखे। उन्होंने बताया कि शैलेश तांबेकर वर्ष 1997 से बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में पूरी निष्ठा के साथ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय में सेवा करते हुए कई दशक गुजार दिए हैं।
समानता के अधिकार का हनन, एकल पीठ ने विवि प्रशासन को लगाई फटकार
अधिवक्ता रायजादा ने अदालत को अवगत कराया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने शैलेश के बाद सेवा में आए कई अन्य कनिष्ठ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित कर दिया है। इसके विपरीत, वरिष्ठ होने के बावजूद याचिकाकर्ता शैलेश तांबेकर को नियमितीकरण के लाभ से लगातार वंचित रखा गया। कई बार प्रत्यावेदन देने के बाद भी विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने इस पर कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया, जिससे क्षुब्ध होकर कर्मचारी को उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। एकल पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद याचिकाकर्ता के तर्कों में दम पाया। अदालत ने कहा कि एक ही संवर्ग में कार्य कर रहे कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। यदि बाद में नियुक्त कनिष्ठ कर्मियों को नियमित किया गया है, तो वरिष्ठ कर्मी स्वतः ही उस लाभ का हकदार बन जाता है। अदालत ने बरकतउल्ला विश्वविद्यालय को आदेश दिया कि वह शैलेश तांबेकर को नियमित करने की औपचारिकताएं शीघ्र पूरी करे और उन्हें समस्त देय लाभ प्रदान करे।
