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लक्ष्मीपुर में 250 परिवारों की झुग्गी झोपड़ी हटाने के मामले में फैसला सुरक्षित


जबलपुर।
लक्ष्मीपुर में 200-250 परिवारों की झुग्गी-झोपड़ी हटाने के मामले में 19 सितंबर को जनहित के मामले में न्यायाधिपति विशाल मिश्रा की अदालत में सुनवाई हुई। न्यायालय के समक्ष जबलपुर नगर निगम, विकास प्राधिकरण और केसरवानी शिक्षा समिति और याचिका कर्ता हस्तक्षेप कर्ता झुग्गी वासी सभी को सुनने के बाद मामले को आदेश के लिए सुरक्षित कर लिया है। 

जबलपुर विकास प्राधिकरण द्वारा एमआर-4 से लगी हुई जगह, जो लक्ष्मीपुर के नाम से जाने जाती है। उसको 1990 में एक्वायर किया था। लक्ष्मीपुर लगभग 8 हेक्टेयर भूमि थी, जिसको टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के अंतर्गत जबलपुर विकास योजना में तालाब को पूर कर आवासीय प्रयोग के लिए रखा था। झोपड़ पट्टी और पट्टा धारकों की ओर से रविंद्र गुप्ता (डेमोक्रेटिक लॉयर्स फॉर्म के सचिव) सीनियर एडव्होकेट शशांक शेखर ने न्यायालय को बताया की इस जगह से लगी हुई जगह कॉलेज स्कूल के लिए छोड़ी गई थी। केसरवानी शिक्षा समिति द्वारा कॉलेज बनाया गया है। बाद में उसे संस्था द्वारा वह जगह लीज पर ले ली गई, जिस पर ये परिवार निवासरत हैंं। इनमें 50 से 100 परिवार पट्टा धारी हैं। अब केसरवानी शिक्षा समिति उसे जगह को खाली करने के लिए उच्च न्यायालय आया था। जबलपुर विकास प्राधिकरण और नगर निगम ने भी सहयोग का वादा किया था। हस्तक्षेपकर्ता अधिवक्ताओं ने बताया बताया कि यह आश्चर्यजनक बात है कि एक ही अधिवक्ता द्वारा केसरवानी शिक्षा समिति और बाद में उसी से जुड़े हुए मामले में नगर निगम की ओर से पक्ष रखा गया और इस बात की कोर्ट में अंडरटेकिंग दी गई कि इसको 60 दिन में खाली कर लिया जाएगा। यह अधिवक्ता अधिनियम का सीधा उल्लंघन है। पिछला आदेश लेते समय न्यायालय के संज्ञान में नहीं लाया गया कि वहां रह रहे गरीब लोग, जिनमें से लगभग 40ः लोगों को शासन द्वारा 28 साल का पट्टा नगरी क्षेत्र के भूमिहीन अधिनियम के अंतर्गत दिया गया है। 

23 जुलाई को जब पूरा प्रशासन अतिक्रमण हटाने पहुंचा तब डेमोक्रेटिक डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम के वकीलों ने सचिव रविंद्र गुप्ता ने पहुंचकर दोपहर में किसी तरह अधिकारियों से निवेदन किया कि यह गलत हो रहा है। इसमें पट्टा धारी भी हैं। उन्हें अभी अन्यत्र कहीं बसाया नहीं गया है। उनको मुआवजा नहीं दिया गया है। अतः उनको हटाया नहीं जा सकता। प्रशासन द्वारा 24 घंटे का समय दिया गया, तब अगले दिन उच्च न्यायालय में यह संज्ञान में लाने पर अतिक्रमण की कार्यवाही को हटाने के लिए रोक लगा दी गई थी। बिजली काटने से भी रोक लगाई गई थी।  यह महत्वपूर्ण है कि जबलपुर विकास प्राधिकरण द्वारा पूर्व से बसे हुए गरीब परिवारों को हटाने से छोड़ दिया गया था। उन्हीं को मध्य प्रदेश शासन द्वारा 1998 में 28 वर्ष का पट्टा दिया गया था। जनप्रतिनिधियों ने करोड़ों रुपए खर्च कर वहां रोड बनाई है और बिजली पानी की व्यवस्था करवाई थी।  पिछले 20 वर्षों में वहां और भी 100-150 परिवार आकर बस गए। वर्तमान में उसे क्षेत्र में लगभग 200 से 250 परिवार निवास कर रहे हैं।

हस्तक्षेपकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि वहां रह रहे निवासियों को बिना सुनवाई के, बिना मुआवजा दिए, पट्टे की अवधि को समाप्त हुए बिना बिना, न्यायालीन प्रक्रिया को फॉलो किए बिना उन्हें हटाया नहीं जा सकता है। वहां 15 वर्ष से अधिक समय से वहां निवासरत को धारणाधिकार के अंतर्गत पट्टा देने की शासन की योजना है और जिन्हें पट्टे नहीं मिले हैं उनको भी पट्टे मिलने चाहिए। इस मामले में जबलपुर विकास प्राधिकरण और नगर निगम की भी की मिलीभगत  प्रतीत होती है।

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