जबलपुर। मध्य प्रदेश को दुग्ध राजधानी यानी मिल्क हब के रूप में विकसित करने की सरकारी कार्ययोजना में जबलपुर को स्थान न मिलने पर नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच ने तीव्र विरोध प्रकट किया है। इस संदर्भ में आयोजित एक आवश्यक बैठक के दौरान डॉ. पी.जी. नाजपांडे, रजत भार्गव, डॉ. ए.बी. श्रीवास्तव, एडवोकेट वेदप्रकाश अधोलिया और मनीष शर्मा ने 20 अगस्त को जारी प्रशासनिक सूचना पर असंतोष व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री को विधिवत आपत्ति पत्र प्रेषित किया। मंच का स्पष्ट मत है कि राज्य में सर्वाधिक दुग्ध संकलन और समृद्ध पशुधन आधार होने के उपरांत भी जिले को बाहर रखना एक गंभीर नीतिगत चूक है। प्रतिनिधियों ने शासन से मांग की है कि इस निर्णय की समीक्षा कर क्षेत्र के डेयरी उत्पादकों के साथ न्याय किया जाए।
विशाल पशुधन क्षमता के बावजूद जिले को नकारा
जिले में प्रतिदिन 4.5 से 5 लाख लीटर दूध का निरंतर संकलन होता है, जो पूरे प्रदेश में सबसे बड़ा रिकॉर्ड माना जाता है। इसके अलावा शहरी सीमा और निकटवर्ती ग्रामीण अंचलों में लगभग 350 संगठित डेयरियों का सफल संचालन हो रहा है। नवीनतम पशुगणना से यह प्रामाणिक जानकारी सामने आई है कि यहां मादा भैंसों की कुल आबादी करीब 70000 दर्ज की गई है। संख्या बल और उत्पादन क्षमता के मामले में यह क्षेत्र पूरे प्रदेश में शीर्ष पायदान पर स्थित है। इतना मजबूत ढांचा होने के कारण यह संभाग स्वाभाविक रूप से प्रदेश के प्रमुख दुग्ध केंद्र के रूप में चुने जाने की हर आवश्यक कसौटी को पूरी तरह पूरा करता है।
बायोगैस सीएनजी प्लांट ग्वालियर भेजने से असंतोष गहराया
इतने बड़े पैमाने पर स्थापित डेयरी तंत्र के कारण बायोगैस सीएनजी संयंत्र की स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त स्थान यही अंचल बनता है। प्रचुर मात्रा में नियमित कच्चा माल उपलब्ध होने के बावजूद इस महत्वपूर्ण हरित ऊर्जा परियोजना को ग्वालियर स्थानांतरित कर दिया गया, जिसे स्थानीय हितों के साथ पक्षपात माना जा रहा है। मवेशियों से प्राप्त अपशिष्ट का वैज्ञानिक निस्तारण करने, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने तथा स्वच्छ ऊर्जा के निर्माण के लिए इस इकाई की स्थापना महाकोशल क्षेत्र में होना आवश्यक था। जन प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार से जमीनी वास्तविकताओं का पुनः परीक्षण कर इस विसंगति को अविलंब दूर करने और पशुपालकों के वैध अधिकारों को बहाल करने का आग्रह किया है।
