जबलपुर। केंद्र सरकार द्वारा देश के 500 जिलों को निर्यात केंद्र बनाने की राष्ट्रीय योजना में मध्य प्रदेश के 5 प्रमुख शहरों इंदौर, भोपाल, उज्जैन, ग्वालियर और नर्मदापुरम को शामिल किया गया है, लेकिन जबलपुर का नाम बाहर रखा गया है। इस फैसले के बाद महाकौशल अंचल में व्यापक रोष फैल गया है। राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने सोशल मीडिया पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे शहर के साथ आर्थिक और राजनीतिक भेदभाव करार दिया है। स्थानीय उद्यमियों और व्यापारिक संगठनों ने भी सरकार के इस कदम पर निराशा जताई है। उनका कहना है कि विपुल औद्योगिक व कृषि क्षमताओं के बावजूद जिले की अनदेखी की गई है।
मजबूत क्षमता के बावजूद जिले की खुली अनदेखी
महाकौशल क्षेत्र रक्षा उत्पादन, संगमरमर आधारित स्टोन क्राफ्ट और खास पहचान रखने वाले हरे मटर की पैदावार में हमेशा अव्वल रहा है। यहां के उत्तम गुणवत्ता वाले कृषि उत्पाद देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों में भी अपनी मजबूत धाक रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीधी पहुंच, आधुनिक लॉजिस्टिक सपोर्ट और उपयुक्त ब्रांडिंग की सुविधा न मिलने से स्थानीय व्यापार सीमित दायरे में बंधकर रह गया है।
व्यापारिक विकास और नए रोजगार के अवसर प्रभावित
एक्सपोर्ट हब योजना का मूल लक्ष्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को वैश्विक व्यापार तंत्र से जोड़ना है। स्थानीय औद्योगिक इकाइयों का मानना है कि यदि शहर को इस सूची में स्थान मिलता, तो क्षेत्रीय स्तर पर नया पूंजी निवेश आता और युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर खुलते। विशेष वित्तीय प्रोत्साहनों और निर्यात सुविधाओं से वंचित रह जाने के कारण क्षेत्रीय कारोबारियों की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति कमजोर होगी।
आर्थिक उपेक्षा पर अब सरकारों से जवाब तलब
सांसद ने नागरिकों के शांत स्वभाव और उदारता को प्रशासनिक स्तर पर कमजोरी समझे जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संपूर्ण महाकौशल क्षेत्र में अब यह मांग तेजी पकड़ रही है कि चयन प्रक्रिया के मापदंडों को पारदर्शी बनाया जाए। सूची से बाहर होने के इस निर्णय से प्रदेश की राजनीति में तीखी बहस छिड़ गई है और सभी की निगाहें अब केंद्र तथा राज्य शासन के आधिकारिक रुख पर टिकी हैं।
