जबलपुर। सीधी निवासी स्वर्गीय धैर्यमणि शर्मा के प्रकरण में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि 2 अक्टूबर 1959 से पहले हुए भूमि हस्तांतरण के मामले में मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी के तहत जांच नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति संजीव एस. कलगांवकर ने याचिका स्वीकार करते हुए सिंगरौली जिले के चितरंगी के अनुविभागीय अधिकारी सहित अन्य राजस्व अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों को निरस्त कर दिया।
मामला सिंगरौली जिले की भूमि से संबंधित था। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजय रायजादा एवं अंजना श्रीवास्तव ने दलील दी कि राजस्व अभिलेखों के अनुसार विवादित भूमि पर याचिकाकर्ता पक्ष का कब्जा वर्ष 1956 से था और वह वर्ष 1956 से ही राजस्व रिकॉर्ड में भूमिस्वामी के रूप में दर्ज था। मूल भूमि स्वामी बिरबल द्वारा भूमि का हस्तांतरण किए जाने के बाद याचिकाकर्ता के पक्ष में नामांतरण किया गया था।
बाद में धनुकधारी सिंह गोंड एवं अन्य ने मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 170-क्च के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। इसे हाइकोर्ट में चुनौती दी गई। एसडीओ चितरंगी ने 9 सितंबर 2011 को याचिकाकर्ता की कार्यवाही की पोषणीयता संबंधी आपत्ति खारिज कर दी। इसके बाद कलेक्टर, अतिरिक्त आयुक्त और बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने भी क्रमश: याचिकाकर्ता के विरुद्ध आदेश पारित किए।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में हाल ही में पारित पितैया अहीर मामले में निर्धारित विधि का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 170-बी का स्पष्ट वैधानिक दायरा 2 अक्टूबर 1959 से लेकर 24 अक्टूबर 1980 तक की अवधि में हुए हस्तांतरणों से संबंधित है। 2 अक्टूबर 1959 से पहले हुए लेन-देन को इस प्रावधान के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता।
कोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता वर्ष 1956 से भूमि पर कब्जे में था और राजस्व रिकॉर्ड में भी वर्ष 1956 से भूमिस्वामी के रूप में दर्ज था। इसलिए भूमि का हस्तांतरण 2 अक्टूबर 1959 से पहले का होने के कारण धारा 170-क्च के तहत एसडीओ द्वारा जांच शुरू करने का अधिकार क्षेत्र ही नहीं बनता था। हाईकोर्ट ने सिंगरौली के एसडीओ, कलेक्टर, रीवा के अतिरिक्त आयुक्त और बोर्ड ऑफ रेवेन्यू द्वारा पारित सभी संबंधित आदेशों को निरस्त कर दिया। साथ ही धारा 170-बी के तहत एसडीओ चितरंगी द्वारा शुरू की गई पूरी कार्यवाही को भी अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए समाप्त कर दिया। याचिका को हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
