जबलपुर। नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज जबलपुर में कथित तौर पर पर्ची वितरण और काउंटर शुल्क वसूली में हुई 70 लाख की गड़बड़ी के मामले को लेकर दायर जनहित याचिका को उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायाधीश प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर किसी भी तरह का अंतिम निष्कर्ष या कानूनी निर्णय नहीं लिया जा सकता है। अदालत ने कहा कि जब तक आरोपों का ठोस और प्रामाणिक आधार न हो, तब तक सिर्फ प्रकाशित सामग्रियों पर भरोसा करके न्यायिक आदेश देना उचित नहीं है। याचिकाकर्ता ने अस्पताल परिसर में मरीजों से रसीद काटने और शुल्क लेने में वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाया था। उन्होंने संपूर्ण जांच कराने और व्यवस्था को सुधारने की मांग की थी।
फर्जीवाड़े में पुख्ता सबूत अनिवार्य
न्यायालय ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि प्रस्तुत याचिका पूरी तरह से केवल मीडिया रिपोर्टों पर ही आधारित थी। इसके पक्ष में कोई स्वतंत्र या प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया था। प्रशासनिक स्तर पर संस्थान के डीन डॉ. नवनीत सक्सेना और जांच समिति द्वारा पहले ही मामले की विभागीय पड़ताल की जा चुकी है। अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों को अपर्याप्त माना और याचिका को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि यदि उनके पास कोई ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध होते हैं, तो वे अपनी बात को सक्षम स्तर पर दोबारा प्रस्तुत कर सकते हैं। अदालत के इस फैसले से प्रशासनिक तंत्र को राहत मिली है, वहीं याचिकाकर्ताओं को यह संदेश भी मिला है कि न्यायपालिका में जनहित याचिकाओं के लिए केवल समाचार पत्रों की कटिंग पर्याप्त नहीं होती। कानूनी प्रक्रिया में दस्तावेजी प्रमाणों की उपस्थिति ही सबसे प्रमुख आधार होती है।
