जबलपुर। नरसिंहपुर में सात कम्पोजिट शराब दुकानों की लाइसेंसधारी महिला अर्चना शिवहरे के साथ 9870 रुपए का फ्रॉड हुआ और उनके बैंक खाते में मौजूद 2.51 करोड़ रुपए से अधिक की राशि को संदिग्ध साइबर ट्रांजेक्शन के आधार पर फ्रीज कर दिया गया। इस मामले में जबलपुर हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।पुलिस की इस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेशभर के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां पूरे बैंक खाते को फ्रीज करने के बजाय, जहां तक संभव हो, केवल विवादित राशि पर ही लियन या डेबिट फ्रीज लगाएं। पूरे खाते को फ्रीज करना अंतिम और असाधारण परिस्थिति में ही अपनाया जाने वाला कदम होना चाहिए। जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि संदिग्ध लेन-देन की राशि सीमित है, तो पूरे खाते पर रोक लगाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों को कथित अपराध से जुड़ी राशि और खाते में मौजूद वैध धनराशि के बीच अंतर करना चाहिए तथा केवल उतनी ही रकम पर रोक लगानी चाहिए, जितनी जांच के लिए आवश्यक हो। कोर्ट ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें 980 रुपए के संदिग्ध साइबर ट्रांजेक्शन के आधार पर 2,51,72,192.57 रुपए वाले पूरे चालू खाते को फ्रीज कर दिया गया था। गौरतलब है कि भोपाल निवासी याचिकाकर्ता अर्चना शिवहरे नरसिंहपुर जिले में सात कम्पोजिट शराब दुकानों की लाइसेंसधारी हैं। इन सभी दुकानों का वित्तीय लेन-देन उनके एक ही चालू बैंक खाते के माध्यम से होता है। अप्रैल 2026 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इटारसी शाखा ने बिना किसी पूर्व सूचना के उनका बैंक खाता फ्रीज कर दिया। बाद में पता चला कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा-106 के तहत दर्ज साइबर अपराध से जुड़ी शिकायत के आधार पर यह कार्रवाई की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऐश्वर्य साहू ने हाईकोर्ट में दलील दी कि संदिग्ध साइबर लेन-देन की राशि महज 980 रुपए है, जबकि खाते में 2.51 करोड़ रुपए से अधिक जमा हैं। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि यदि जांच के लिए आवश्यक हो तो केवल 980 रुपए की राशि पर रोक लगाई जाए और शेष धनराशि के संचालन की अनुमति दी जाए। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना एक असाधारण कार्रवाई है और इसे सामान्य प्रक्रिया के तौर पर नहीं अपनाया जा सकता। जांच एजेंसी को कथित अपराध से जुड़ी राशि और खाते में मौजूद वैध धनराशि के बीच अंतर करते हुए केवल उतनी ही रकम पर रोक लगानी चाहिए, जितनी जांच के लिए आवश्यक हो।