हाईकोर्ट ने प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम) के कथित दुरुपयोग से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है। जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने अपने फैसले में एससी-एसटी वर्ग की महिलाओं को दुष्कर्म के मामलों में मिलने वाली शासकीय आर्थिक सहायता का उल्लेख करते हुए कहा कि पीडि़ता को यह स्पष्ट लिखना होगा कि वह अपने आरोपों पर कायम रहेगी, जिससे इस अधिनियम का दुरुपयोग न हो। जस्टिस विशाल मिश्रा ने कहा कि नियमों के अनुसार पीडि़ता को लगभग 75 प्रतिशत राशि दी जानी चाहिए। हालांकि, इसके लिए उसे अपनी ओर से एक एफिडेविट देना होगा कि सहायता राशि लेने के बाद वह अपने बयान से नहीं मुकरेगी और न ही आरोपी से कोई समझौता करेगी। आदेश में यह भी कहा कि, पीडि़ता को एफिडेविट में स्पष्ट लिखना होगा कि उसके आरोपों पर वह कायम रहेगी। यदि महिला 15 दिनों के भीतर ऐसा एफिडेविट प्रस्तुत कर देती है, तो शासन की ओर से उसे शेष राशि दे दी जाएगी। हालांकि, जस्टिस विशाल मिश्रा ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि एफिडेविट प्रस्तुत नहीं किया जाता है, तो याचिकाकर्ता को यह राशि नहीं मिलेगी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा यदि एफिडेविट देने के बाद महिला समझौता कर लेती है, बयान से मुकर जाती है या होस्टाइल हो जाती है, तो उसके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाएगा और दी गई पूरी राशि की वसूली भी की जाएगी।
पीडि़ता बोली, 4 साल बीतने के बाद भी नहीं मिली पूरी राशि-
हाईकोर्ट में वर्ष 2022 के एक दुष्कर्म मामले की सुनवाई हुई थी, जिसकी आदेश प्रति अब सामने आई है। आदेश के अनुसार, जबलपुर के खमरिया थाना क्षेत्र की एसटी वर्ग की एक महिला ने अपने साथ दुष्कर्म की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद दुष्कर्म की धाराओं के साथ प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट भी लगाया था। प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट में प्रावधान है कि यदि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की किसी महिला के साथ दुष्कर्म का मामला दर्ज होता है, तो उसे सरकारी खजाने से 5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जाती है। पीडि़ता का कहना है कि वर्ष 2022 से अब तक चार साल बीत चुके हैं, लेकिन उसे अभी तक केवल 75 हजार रुपए की आर्थिक सहायता मिली है।
75 प्रतिशत राशि मिलने के बाद कथित पीडि़ता बयान से मुकर जाती हैं-
कोर्ट के समक्ष कई ऐसे तथ्य भी रखे गए, जिनमें दुष्कर्म का मामला दर्ज होने के बाद मेडिकल रिपोर्ट आने और ट्रायल शुरू होने तक कथित पीडि़ता को 75 प्रतिशत राशि मुआवजे के रूप में दे दी जाती है, लेकिन बाद में ट्रायल के दौरान महिला बयान से मुकर जाती है, जिससे आरोपी बरी हो जाता है। ऐसे मामलों में शासन के खजाने से खर्च की गई सार्वजनिक धनराशि व्यर्थ चली जाती है।
