जबलपुर। स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत कार्य करने वाली आशा कार्यकर्ताओं को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि के वितरण में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं सामने आई। यह मामला प्रशासन की लापरवाही और भ्रष्टाचार की एक बड़ी मिसाल बन गया है। इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने सख्त रुख अपनाते हुए हस्तक्षेप किया है। विभाग में पहले से तैयार की गई जांच रिपोर्ट को दबाने का प्रयास किया जा रहा था, जिस पर अब लगाम लग गई है। अब इस पूरे मामले की जांच की कमान जबलपुर जिला कलेक्टर राघवेंद्र सिंह को सौंपी गई है। कलेक्टर के पास जिम्मा आने के बाद अब भ्रष्टाचार से जुड़ी फाइलों को फिर से खोला जा रहा है ताकि दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सके।
जिम्मेदार अधिकारियों ने साधी थी खामोशी, रिपोर्ट पर पर्दा डालने का खेल
इस वित्तीय गड़बड़ी को लेकर पहले एक टीम गठित की गई थी जिसने अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों ने उस रिपोर्ट को महीनों तक ठंडे बस्ते में डाले रखा। दोषियों को बचाने और मामले पर पर्दा डालने का स्पष्ट खेल खेला जा रहा था, जिससे विभाग की छवि पर सवाल उठ रहे थे। स्वास्थ्य मुख्यालय तक जब यह शिकायत पहुंची, तब जाकर अपर मुख्य सचिव ने स्थानीय स्तर पर चल रही ढुलमुल नीति को समाप्त करने का निर्णय लिया। इस प्रशासनिक बदलाव के बाद अब उन सभी संदिग्धों की पहचान की जा रही है जिन्होंने इस घोटाले को अंजाम दिया है। अब किसी भी दोषी को बख्शने की संभावना नहीं है।
डिजिटल रिकॉर्ड और बैंक खातों के मिलान पर फोकस
जिला कलेक्टर को जिम्मेदारी मिलने के बाद अब जांच का दायरा बढ़ा दिया गया है। प्रोत्साहन राशि वितरण के डिजिटल रिकॉर्ड और संबंधित आशा कार्यकर्ताओं के बैंक खातों के लेनदेन का बारीकी से मिलान किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जो राशि वास्तविक रूप से हकदार आशा कार्यकर्ताओं को मिलनी चाहिए थी, वह किन जेबों में गई। इस कदम से विभाग के भ्रष्ट कर्मचारियों और अधिकारियों में हड़कंप की स्थिति है। जांच प्रक्रिया के पूरी होने पर अब दोषियों के खिलाफ सख्त वैधानिक कार्रवाई तय मानी जा रही है। इस मुहिम से उम्मीद जगी है कि अब आशा कार्यकर्ताओं को उनका हक मिलेगा और भ्रष्ट तंत्र का पर्दाफाश होगा।
