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गेहूं घोटाले की जांच में बड़े चेहरों को बचाने का खेल, सबूतों के बाद भी अफसर कार्रवाई से बाहर



जबलपुर। मझौली में भूमि महिला संगठन से 5100 क्विंटल गेहूं गायब होने के मामले में प्रशासनिक घालमेल खुलकर सामने आ गया है। इस महाघोटाले में उपार्जन समिति के अधिकारियों, खाद्य विभाग के प्रभारी और स्वर्णा वेयरहाउस के संचालक की संदेहास्पद भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जांच टीम के हाथ मोबाइल डेटा, कथित वित्तीय लेन-देन के लिखित रिकॉर्ड और राजस्व तथा प्रशासनिक अधिकारियों की कॉल डिटेल्स जैसे पुख्ता डिजिटल साक्ष्य लगे हैं। इसके बावजूद किसी भी रसूखदार बड़े अफसर पर शिकंजा नहीं कसा गया है। शुरुआती जांच प्रतिवेदन को बदलकर नया प्रतिवेदन तैयार करने से पूरी प्रशासनिक निष्पक्षता कटघरे में है, जिससे साफ है कि छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर मुख्य साजिशकर्ताओं को बचाने की कोशिश की जा रही है।

​अफसरों को बचाने के लिए बदली गई मूल जांच रिपोर्ट

​करोड़ों रुपये के गेहूं की हेरफेरी को दबाने के लिए एक ही क्रमांक से दो अलग-अलग दस्तावेज जारी किए गए। शुरुआती जांच में जो कड़े तथ्य और नाम सामने आए थे, उन्हें बाद में तैयार की गई नई रिपोर्ट में पूरी तरह गायब कर दिया गया। सूत्रों के अनुसार, जांच दल ने मिलीभगत करके स्वर्णा वेयरहाउस के संचालक का नाम मुख्य कागजातों से हटा दिया, जिससे साफ है कि बड़े चेहरों को प्रशासनिक संरक्षण मिल रहा है।

​घटिया अनाज की खरीदी पर जिम्मेदार अधिकारियों की मूक सहमति

​स्वर्णा वेयरहाउस के संचालक ने निरंदपुर सोसाइटी और स्थानीय व्यापारियों के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर मिट्टी युक्त और बेहद खराब गुणवत्ता का गेहूं खरीदा था। क्षेत्रीय प्रबंधक की जांच में जहां 3500 बोरियों में कचरा और घटिया अनाज पाया गया था, वहीं बाद में खाद्य और नान के अधिकारियों ने केवल 2500 बोरियों को ही गड़बड़ बताकर मामले की लीपा-पोती कर दी, जबकि रात में बोरियां बदलने के सीसीटीवी फुटेज भी मौजूद हैं।

​कॉल डिटेल्स और हस्तलिखित हिसाब-किताब की अनदेखी

​मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद भी प्रभावी विधिक कार्रवाई नहीं हो पा रही है। आरोपियों के मोबाइल से बरामद हस्तलिखित डायरी के पन्ने और अधिकारियों के बीच हुई बातचीत की कॉल डिटेल्स से साफ है कि इस पूरे सिंडिकेट में कई सफेदपोश और बड़े प्रशासनिक अधिकारी सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं, लेकिन पर्याप्त सबूतों के बाद भी उन्हें छूने से बचा जा रहा है।

​छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास

​पूरी कार्रवाई के दौरान निचले स्तर के कर्मचारियों को निशाना बनाया जा रहा है ताकि आम जनता के आक्रोश को शांत किया जा सके। इस बड़े आर्थिक अपराध में शामिल मुख्य साजिशकर्ताओं और प्रशासनिक सिंडिकेट को पूरी तरह खुली छूट मिली हुई है, जिससे जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता और मंशा पर लगातार गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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