
नई दिल्ली. केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों, पेंशनभोगियों और श्रमिक संघों के लिए आठवें वेतन आयोग से जुड़ी एक बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है. आयोग के गठन और औपचारिक परामर्श प्रक्रिया में तेजी आने के साथ ही, सातवें वेतन आयोग के ढांचे को आधार बनाकर नए वेतनमान पर गहन चर्चा शुरू हो गई है.
बैठकों का दौर जारी : 15 जून तक बढ़ी तारीख
जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला आठवां केंद्रीय वेतन आयोग इस समय सक्रिय रूप से डेटा जुटाने के चरण में है. आयोग ने हाल ही में एक नया निर्देश जारी करते हुए सभी हितधारकों के लिए अपने आधिकारिक पोर्टल पर ऑनलाइन सुझाव और ज्ञापनों को सौंपने की अंतिम तिथि को बढ़ाकर 15 जून कर दिया है.
साथ ही, आयोग की टीम देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा कर रही है. इसी कड़ी में 1 जून से 4 जून तक श्रीनगर में क्षेत्रीय बैठकें आयोजित की जा रही हैं, जिसके बाद 8 जून को लद्दाख और 22 से 23 जून तक लखनऊ में मूल्यांकन सत्र आयोजित किए जाएंगे. इन दौरों के माध्यम से क्षेत्रीय संस्थागत निकायों और पेंशनर संघों को अंतिम रिपोर्ट का मसौदा तैयार होने से पहले अपने वित्तीय तर्क औपचारिक रूप से प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा.
अखिल भारतीय स्तर पर हो रही क्षेत्रीय बैठकों के बीच कर्मचारी संगठन पिछले एक दशक की संचयी मुद्रास्फीति के असर को कम करने के लिए फिटमेंट फैक्टर—यानी वह गणितीय गुणक जिसका उपयोग मूल वेतन और पेंशन निर्धारित करने के लिए किया जाता है—में भारी बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं.
क्या है फिटमेंट फैक्टर का गणित?
फिटमेंट फैक्टर केंद्रीय कर्मचारियों के संशोधित मूल वेतन और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन की गणना करने का मुख्य प्रशासनिक सूत्र है. इसका मानक समायोजन फॉर्मूला बेहद सीधा है: संशोधित मूल वेतन = वर्तमान मूल वेतन x फिटमेंट फैक्टर.
इतिहास पर नजर डालें तो, साल 2006 में छठे वेतन आयोग ने 1.86 के गुणक को लागू किया था, जिसे बाद में 2016 में सातवें वेतन आयोग के तहत बढ़ाकर 2.57 कर दिया गया. उदाहरण के तौर पर, यदि सातवें वेतन आयोग के तहत किसी कर्मचारी की मूल सैलरी 16,000 रुपये थी, तो 2.57 के गुणक के आधार पर वह संशोधित होकर 41,120 रुपये हो गई थी. चूंकि यह पैमाना सीधे तौर पर शुरुआती सैलरी स्लैब को तय करता है, इसलिए इसमें होने वाला मामूली बदलाव भी कर्मचारियों की क्रय शक्ति और सरकारी खजाने के खर्च पर व्यापक असर डालता है.
महंगाई का दबाव और एक्सपर्ट्स का अनुमान
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दस वर्षों में व्यापक आर्थिक बदलावों के कारण पिछले वेतन संशोधन का वास्तविक मूल्य काफी कम हो गया है. इस संबंध में बैंकबाजार के सीईओ अधिल शेट्टी ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि 2016 से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में लगभग 56 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है, जिसके कारण सातवें वेतन आयोग का 2.57 का गुणक अपनी वास्तविक वैल्यू खो चुका है. शेट्टी के अनुसार, आठवें वेतन आयोग को कर्मचारियों की वास्तविक आय की आवश्यकताओं और सरकार की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के बीच एक सटीक संतुलन बनाना होगा.
आठवें वेतन आयोग को अपनी सिफारिशें सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है, जिसकी समयसीमा 2027 के मध्य तक बैठती है. हालांकि, नया वेतनमान 1 जनवरी 2026 से प्रभावी माना गया है, जिसका अर्थ है कि कर्मचारियों का एरियर पहले से ही बनना शुरू हो चुका है. स्वतंत्र वित्तीय विशेषज्ञों का अनुमान है कि नया फिटमेंट फैक्टर 2.28 से 2.86 के बीच तय हो सकता है. यदि आयोग 2.86 के ऊपरी लक्ष्य को अपनाता है, तो एंट्री-लेवल (शुरुआती पद) के कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी 18,000 रुपये से बढ़कर सीधे 51,480 रुपये हो जाएगी.
कर्मचारी यूनियनों की मांग- 72,000 रु. तक हो न्यूनतम वेतन
विशेषज्ञों के रूढि़वादी अनुमानों के विपरीत, विभिन्न राष्ट्रीय कर्मचारी संघ और स्टाफ एसोसिएशन 3.0 से 4.0 के बीच एक आक्रामक फिटमेंट फैक्टर के लिए दबाव बना रहे हैं. यूनियनों का तर्क है कि शहरी आवास, आधुनिक स्वास्थ्य सेवा और सेवानिवृत्ति के बाद की बढ़ती लागतों को देखते हुए मौजूदा वेतन मैट्रिक्स में बड़े संरचनात्मक बदलाव की जरूरत है. चूंकि भारत में केंद्रीय वेतन संशोधन आमतौर पर दस साल के अंतराल पर होते हैं, इसलिए आठवें वेतन आयोग की नीतियां साल 2036 तक सार्वजनिक क्षेत्र के वेतन रुझान को तय करेंगी. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यदि सरकार उनकी उच्च मांगों को स्वीकार करते हुए 3.8 से 4.0 का गुणक लागू करती है, तो न्यूनतम बेसिक सैलरी 69,000 रुपये से 72,000 रुपये के दायरे में पहुंच सकती है.