कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि बृजेश सिंह की मौत हत्या थी या फिर सड़क हादसा। मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला भी पूरी नहीं पाई गई। यह मामला साल 2013 में अनूपपुर जिले में हुए चर्चित बृजेश सिंह हत्याकांड से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने 26 जून 2019 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201 के तहत दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। 11 मई 2026 को जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद दोनों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। बचाव पक्ष के अनुसार घटना वाले दिन दो बाइक से चार लोग घर लौट रहे थे। एक बाइक पर आधार सिंह और पूरन सिंह सवार थे, जबकि दूसरी बाइक पर बृजेश सिंह और कैलाश बैठे थे। रास्ते में पान नदी के पास खड़े ट्रक से बाइक टकरा गई। हादसे में कैलाश घायल हो गया, जबकि बृजेश की मौके पर मौत हो गई। घटना के बाद आधार सिंह और पूरन सिंह वहां से चले गए थे। अगले दिन बृजेश का शव मिलने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। जांच में सामने आया कि आखिरी बार बृजेश, आधार सिंह, पूरन सिंह और कैलाश के साथ देखा गया था। इसी आधार पर पुलिस ने दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ की और बाद में हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।
कोर्ट में बचाव पक्ष के अहम तर्क-
मामले में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं था और अभियोजन की कहानी केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी मौत का स्पष्ट कारण सामने नहीं आया। बचाव पक्ष ने दलील दी कि डॉक्टरों ने स्वयं माना था कि बृजेश को लगी चोटें सड़क दुर्घटना में भी संभव हैं। कई महत्वपूर्ण गवाह भी अभियोजन के समर्थन में नहीं आए। वहीं अभियोजन पक्ष दुर्घटना में शामिल वाहन, घटनास्थल की स्थिति और मौत के वास्तविक कारण को प्रमाणित नहीं कर सका।