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फर्जी डॉक्टर प्रकरण: दलालों से खरीदी थीं डॉक्टरी की फर्जी डिग्री, भोपाल-ग्वालियर से जुड़ा नेटवर्क



मध्य प्रदेश में मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन फर्जीवाड़ा: संजीवनी क्लीनिकों के डॉक्टरों के दस्तावेजों का री-वेरीफिकेशन शुरू

जबलपुर। मध्य प्रदेश के दमोह और जबलपुर जिलों में संजीवनी क्लीनिकों में फर्जी डॉक्टरों की तैनाती का बड़ा मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में आरोपी सचिन यादव, राजपाल गौर और अजय मौर्य को गिरफ्तार किया है, जो 2 लाख से 7 लाख रुपये लेकर फर्जी मेडिकल डिग्रियां और कूट रचित रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट बांट रहे थे। इस खुलासे के बाद राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और स्वास्थ्य संचालनालय ने प्रदेश के सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। जबलपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नवीन कोठारी ने भोपाल से आदेश आने से पहले ही अपने स्तर पर जांच तेज कर दी है। इस रैकेट के तार भोपाल और ग्वालियर संभाग से जुड़े हैं, जिससे विभाग की चयन प्रक्रिया और अंदरूनी अधिकारियों की साठगांठ पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्वास्थ्य विभाग अब प्रदेश के सभी 500 संजीवनी क्लीनिकों में तैनात डॉक्टरों की डिग्री और रजिस्ट्रेशन का अतिशीघ्र री-वेरीफिकेशन करा रहा है।

​पांच सौ संजीवनी क्लीनिकों में दस्तावेजों की सघन जांच शुरू

​दमोह और जबलपुर में फर्जी डॉक्टरों की गिरफ्तारी के बाद स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क हो गया है। स्वास्थ्य संचालनालय और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को पत्र भेजकर संविदा पर नियुक्त डॉक्टरों के दस्तावेजों की गहनता से जांच करने के आदेश दिए हैं। जबलपुर इस जांच का मुख्य केंद्र बना हुआ है, जहां मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नवीन कोठारी ने अपनी टीम को बिना किसी ढिलाई के सभी डॉक्टरों की डिग्री और मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन की जांच कर जल्द से जल्द रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए हैं ताकि फर्जी डॉक्टरों को तुरंत सेवा से हटाया जा सके।

​दो से सात लाख रुपये में बिक रही थीं डिग्रियां

​पुलिस की शुरुआती पूछताछ में यह बात सामने आई है कि यह फर्जी डिग्री रैकेट बेहद सुनियोजित तरीके से चलाया जा रहा था। पकड़े गए आरोपियों ने स्वीकार किया है कि वे डॉक्टरों की कमी का फायदा उठाकर मोटी रकम वसूलते थे और फर्जी दस्तावेज तैयार करके देते थे। इस गिरोह के तार भोपाल और ग्वालियर संभाग से सीधे जुड़े हुए हैं। आरोपियों से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस अब भोपाल और ग्वालियर के कई और संदिग्धों की तलाश कर रही है, जो इन फर्जी दस्तावेजों को तैयार करने के मुख्य सूत्रधार माने जा रहे हैं।

​चयन प्रक्रिया और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों पर सवाल

​इस फर्जीवाड़े ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की चयन और भौतिक सत्यापन प्रक्रिया की कमियों को उजागर कर दिया है। इन फर्जी डॉक्टरों का लगभग डेढ़ साल तक नौकरी करना विभाग के भीतर बैठे अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत की ओर इशारा करता है। वर्तमान में प्रदेशभर में करीब 750 संजीवनी क्लीनिक स्वीकृत हैं, जिनमें से 250 पद खाली हैं। इन खाली पदों को भरने के नाम पर जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ किया गया। वर्तमान में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग मिलकर इस पूरे नेटवर्क को खत्म करने की कार्रवाई में जुटे हैं।

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