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रेलवे में इंस्पेक्शन का बहाना और परिवार को घुमाना, रेल अफसरों के दौरों की खुली पोल



रेल निरीक्षण के नाम पर अधिकारियों का सैर सपाटा, सरकारी खर्च पर पर्यटन स्थलों की सैर

जबलपुर। पश्चिम मध्य रेलवे के जबलपुर मुख्यालय परिचालन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने निरीक्षण के बहाने सवाई माधोपुर के टाइगर रिजर्व और कोटा के चंबल रिवर फ्रंट की यात्रा की। यह अधिकारी बीते रविवार को दयोदय एक्सप्रेस ट्रेन से सीधे सवाई माधोपुर पहुंचे और वहां घूमने के बाद अगले दिन जयपुर सुपरफास्ट ट्रेन से कोटा आए। कोटा पहुंचते ही वे सीधे चंबल रिवर फ्रंट देखने निकल गए और इसके बाद वापस लौट गए। रेलवे में यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि इससे पहले भी मुख्यालय, दिल्ली रेलवे बोर्ड और देश भर के दर्जनों अधिकारी निरीक्षण के नाम पर कोटा और सवाई माधोपुर घूमने आते रहे हैं। इस प्रकार के दौरों से रेलवे को हर साल करोड़ों रुपए का आर्थिक नुकसान होता है। जिस मंडल में ये अधिकारी जाते हैं, वहां के स्थानीय अधिकारी और कर्मचारी इनकी सेवा में लगे रहते हैं ताकि उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट यानी एसीआर में कोई प्रतिकूल टिप्पणी न दर्ज हो जाए।

​पर्यटन स्थलों के स्टेशनों का बनता है निरीक्षण प्रोग्राम

​रेलवे के अधिकारियों के लिए छुट्टियों का मौसम आते ही अपने परिवार के साथ घूमने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसके लिए वे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले प्रमुख दर्शनीय और पर्यटन स्थलों का चयन करते हैं। कागजों पर इसे आधिकारिक निरीक्षण का नाम दिया जाता है, जबकि असल मकसद परिवार का मनोरंजन करना होता है। पश्चिम मध्य रेलवे के दायरे में आने वाले बांधवगढ़, कान्हा किसली, भेड़ाघाट, बरगी, पचमढ़ी, मड़ई डेम, भोजपुर, सांची, सवाई माधोपुर, भरतपुर, बूंदी, खजुराहो और पन्ना टाइगर रिजर्व जैसे स्थान इन अधिकारियों की पहली पसंद बने हुए हैं। इन पर्यटन स्थलों के पास स्थित रेलवे स्टेशनों का एक निरीक्षण कार्यक्रम तैयार किया जाता है और अधिकारी सपरिवार वहां पहुंच जाते हैं।

​कनिष्ठ कर्मचारी करते हैं सेवा और इंस्पेक्टर बनाते हैं रिपोर्ट

​इस पूरी व्यवस्था में मुख्य निरीक्षण का काम अधिकारी के साथ चलने वाला इंस्पेक्टर ही पूरा करता है और वही निरीक्षण की अंतिम रिपोर्ट भी तैयार करता है। चूंकि यह दौरा मूल रूप से पर्यटन और सैर सपाटे के लिए होता है, इसलिए इस रिपोर्ट में रेलवे व्यवस्था की कोई भी कमी या खामी उजागर नहीं की जाती है। स्थानीय स्तर पर तैनात कनिष्ठ विभागीय अधिकारी और कर्मचारी बड़े अधिकारियों की सेवा के लिए हमेशा तैयार खड़े रहते हैं। कर्मचारियों को डर रहता है कि यदि सेवा में कोई कमी रही, तो उनके करियर पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।

​विजिलेंस और बोर्ड के अधिकारियों की मिलीभगत से जारी है गड़बड़झाला

​निरीक्षण के नाम पर चल रहे इस खेल में रेलवे बोर्ड से लेकर मंडल स्तर के अधिकारी और यहां तक कि सतर्कता यानी विजिलेंस विभाग के अधिकारी भी शामिल रहते हैं। एक ही तंत्र का हिस्सा होने के कारण कोई भी एक-दूसरे के खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। यही कारण है कि इस तरह के फिजूलखर्च और नियमों के उल्लंघन पर आज तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई है। विभागीय साठगांठ की वजह से यह पूरी प्रक्रिया सालों से बिना किसी रोक-टोक के लगातार जारी है।

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