जबलपुर। जिले में निजी स्कूलों द्वारा वर्तमान शैक्षणिक सत्र की फीस का विवरण शासन के नियमों के अनुसार जमा न करना अब उनके लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने इस संबंध में एक बेहद सख्त पत्र जारी किया है। इस आदेश के तहत यदि संबंधित स्कूलों ने निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की, तो उन पर भारी वित्तीय दंड लगाया जाएगा। लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल ने इस पूरे मामले में हो रही देरी को बेहद गंभीरता से लिया है और स्थानीय प्रशासन को तुरंत सख्त कदम उठाने के निर्देश जारी किए हैं।
फीस नियामक नियमों के उल्लंघन पर पांच गुना अर्थदंड की चेतावनी
जिला शिक्षा अधिकारी घनश्याम सोनी ने जिले के सभी निजी स्कूलों के प्राचार्यों और प्रबंधकों को लिखित निर्देश भेजे हैं। इस पत्र में स्पष्ट किया गया है कि मध्यप्रदेश निजी विद्यालय फीस तथा संबंधित विषयों का विनियमन नियम 2020 और संशोधित नियम 2025 के प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य है। इसके तहत प्रत्येक निजी स्कूल को शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए निर्धारित की गई फीस का कक्षा के अनुसार और अलग-अलग मदों के हिसाब से पूरा ब्योरा सरकारी पोर्टल पर दर्ज करना था। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पहले अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2026 निर्धारित की गई थी, जिसे अब बढ़ाकर 20 मई 2026 कर दिया गया है। इस नई समय सीमा के बाद भी लापरवाही बरतने वाले स्कूलों से पांच गुना अधिक जुर्माना वसूला जाएगा।
पोर्टल पर विवरण दर्ज न करने वाले डिफाल्टर स्कूलों की सूची तैयार
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार जबलपुर जिले के कुल 586 अशासकीय स्कूलों ने अब तक फीस रेगुलेशन पोर्टल पर अपने संस्थान की आवश्यक जानकारियां अपलोड नहीं की हैं। इस जानकारी के अभाव में कलेक्टर के आधिकारिक पोर्टल पर भी फीस का विवरण प्रदर्शित नहीं हो पा रहा है, जिससे अभिभावकों को सही जानकारी मिलने में परेशानी हो रही है। शिक्षा विभाग ने इन सभी डिफाल्टर स्कूलों की एक सूची तैयार कर ली है और उन्हें अंतिम अवसर देते हुए तय तारीख तक हर हाल में पोर्टल पर लॉग इन कर डेटा अपडेट करने को कहा है ताकि पारदर्शी व्यवस्था बनी रहे।
शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में 277 स्कूलों के बोर्ड की जानकारी गायब
इस पूरे मामले की जांच के दौरान जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की खुद की एक बड़ी प्रशासनिक चूक भी उजागर हुई है। विभाग द्वारा तैयार की गई डिफाल्टर सूची में से 277 स्कूलों के नाम के आगे बोर्ड के कॉलम में एनए यानी नॉट अवलेबल दर्ज है। इसका सीधा मतलब यह है कि शिक्षा विभाग को खुद यह पता नहीं है कि ये स्कूल किस शिक्षा बोर्ड से संबद्ध या मान्यता प्राप्त हैं। इस लापरवाही के कारण इन स्कूलों के संचालन और उनकी नियमित निगरानी व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्टेट बोर्ड और अन्य बोर्ड से संबद्ध स्कूलों का गणित
विभागीय आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि कुल 586 डिफाल्टर स्कूलों में से 304 स्कूल ऐसे हैं जो सीधे तौर पर स्टेट बोर्ड से संबद्ध हैं। वहीं दूसरी तरफ बचे हुए 277 स्कूलों के बोर्ड का रिकॉर्ड सरकारी फाइलों में उपलब्ध नहीं है। भोपाल से मिले कड़े निर्देशों के बाद अब स्थानीय शिक्षा विभाग इस दोहरी चुनौती से निपटने की तैयारी कर रहा है, जिसमें एक तरफ स्कूलों से फीस का ब्योरा लेना है और दूसरी तरफ अपने रिकॉर्ड को भी दुरुस्त करना है।
