जबलपुर। मध्य प्रदेश में पिछले सात सालों से हो रही झमाझम बारिश के सिलसिले पर इस बार ब्रेक लगता नजर आ रहा है। भारतीय मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान ने राज्य सरकार और किसानों की चिंता बढ़ा दी है। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस साल अल-नीनो के एक्टिव होने के कारण मध्य प्रदेश में मानसून कमजोर रहेगा, जिससे भोपाल, इंदौर और जबलपुर समेत प्रदेश के 47 जिलों में सूखे जैसे हालात या सामान्य से काफी कम बारिश होने की आशंका है।
देरी से आएगा मानसून
मौसम विभाग के अनुसार, इस बार मध्य प्रदेश में मानसूनी हवाओं की रफ्तार काफी सुस्त है। यही वजह है कि राज्य में मानसून की एंट्री अपने तय समय से 5 से 8 दिन की देरी से होगी। प्रदेश में 20 जून के बाद ही मानसूनी बादल दस्तक देंगे। जून के महीने में पूरे प्रदेश में सामान्य से बेहद कम पानी गिरने के आसार हैं। हालांकि, जुलाई के महीने में मानसूनी सिस्टम थोड़ा मजबूत हो सकता है, जिससे कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। इस साल मानसून की बेरुखी के पीछे सबसे बड़ी वजह अल-नीनो प्रभाव को माना जा रहा है। जून से लेकर अगस्त तक प्रशांत महासागर में कमजोर से मध्यम स्तर का अल-नीनो एक्टिव रहेगा।
क्या है अल-नीनो?
अल-नीनो के कारण समुद्र का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। जब यह एक्टिव होता है, तो प्रशांत महासागर से भारत की तरफ बढ़ने वाली ठंडी और नमी से भरी मानसूनी हवाओं का रास्ता रोक देता है। हवा का पैटर्न बदलने से पूरी दुनिया में बारिश का चक्र बिगड़ जाता है। इसके चलते भारत में मानसूनी हवाओं की रफ्तार धीमी हो जाती है और कम बारिश होती है।
इस मानसून कहां कितना बरसेगा पानी?
मध्य प्रदेश में मानसून का औसत कोटा 37.3 इंच रहता है, लेकिन इस साल इसके घटकर 30 से 32 इंच तक ही सीमित रहने का अनुमान है। जिलों के आधार पर मानसून का गणित कुछ इस प्रकार रहेगा:
सामान्य या अधिक बारिश
ग्वालियर, भिंड, नीमच, दमोह, अनूपपुर, उज्जैन, आलीराजपुर और बड़वानी (कुल 8 जिले)।
इन क्षेत्रों में खेती और जलभराव की स्थिति सामान्य रहेगी।
10% से 15% की कमी
अशोकनगर, सागर, नर्मदापुरम, रायसेन, मंडला, डिंडौरी, खरगोन, बुरहानपुर और नरसिंहपुर।
शुरुआती बुआई प्रभावित हो सकती है।
90% तक कम बारिश
भोपाल, इंदौर, जबलपुर समेत बाकी बचे सभी 47 जिले।
सूखे जैसे हालात, सिंचाई के पानी और गिरते भूजल स्तर का संकट।
फसलों पर पड़ेगा सीधा असर, बढ़ेगा जलसंकट
साल 2024 (44.1 इंच) और 2025 (45.2 इंच) में मध्य प्रदेश में कोटे से कहीं ज्यादा बारिश दर्ज की गई थी। अच्छी बारिश के बूते पिछले दो सालों में राज्य में सोयाबीन का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 2 क्विंटल तक बढ़ गया था। यही नहीं, गेहूं और चने की भी बंपर पैदावार हुई थी, जिसके चलते सरकार ने समर्थन मूल्य पर रिकॉर्ड 104 टन से अधिक गेहूं की खरीदी की थी।
इस साल कम बारिश की आशंका ने कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। फसलों का उत्पादन घटने के साथ-साथ राज्य में पेयजल का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। विडंबना यह है कि पिछले साल रिकॉर्ड तोड़ बारिश होने के बावजूद इंदौर और ग्वालियर जैसे बड़े शहरों में लोग आज भी पानी के लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में इस साल मानसून की यह बेरुखी भविष्य में जलसंकट को और भयावह बना देगी।
पिछले 10 सालों में एमपी की मानसूनी चाल
अगर मध्य प्रदेश के पिछले 10 वर्षों के मानसूनी आंकड़ों को खंगालें, तो राज्य ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। सबसे सूखा साल (2017): पिछले एक दशक में 2017 सबसे खराब साल रहा, जब राज्य में महज 29.9 इंच बारिश हुई थी। इसके बाद 2018 में भी 34.3 इंच पानी ही गिरा था। सबसे ज्यादा बारिश (2019): साल 2019 इतिहास के पन्नों में दर्ज है, जब सूबे में रिकॉर्ड 53 इंच बारिश हुई थी।