
जबलपुर. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (मुख्य पीठ, जबलपुर) में एक कर्मचारी द्वारा वरकतउल्ला विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ वेतन रोकने और प्रताड़ित करने का गंभीर आरोप लगाते हुए याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता शैलेश तांबेकर ने न्यायालय से गुहार लगाई है कि उनका रोका गया वेतन तुरंत जारी करने के आदेश दिए जाएं, क्योंकि उनका परिवार अब भुखमरी की कगार पर है।
मुख्य विवाद और आरोप
याचिका (W.P. No. 5002/2009) के अनुसार, शैलेश तांबेकर की नियुक्ति 2 जून 1997 को हुई थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उनके जूनियर कर्मचारियों को 16 जुलाई 2018 को नियमित (Regularized) कर दिया गया, जबकि उन्हें इस लाभ से वंचित रखा गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि उन्होंने विश्वविद्यालय में हो रही अनियमितताओं और 'कुकृत्यों' के खिलाफ जांच की मांग की थी, जिसके प्रतिशोध में प्रशासन उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित कर रहा है। याचिका में कहा गया है कि बिना किसी ठोस कारण के उनका वेतन रोक दिया गया है, जबकि वे नियमित रूप से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। न्यायालय की अब तक की कार्यवाही
दस्तावेजों के अनुसार, इससे पहले भी वेतन रोकने के मामले में एक अंतरिम आवेदन लगाया गया था, जिस पर कोर्ट ने 7 अप्रैल 2025 को नोटिस जारी किया था। इसके बाद प्रशासन ने मई 2025 तक का वेतन तो दिया, लेकिन अब फिर से वेतन रोक दिया गया है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अजय रायजादा ने कोर्ट के समक्ष दलील दी है कि वेतन रोकना न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी क्रूर है। याचिका में स्पष्ट कहा गया है कि "वेतन न मिलने के कारण याचिकाकर्ता और उनका परिवार दाने-दाने को मोहताज है। न्यायालय से प्रार्थना की गई है कि न्याय के हित में विश्वविद्यालय प्रशासन (प्रतिवादियों) को तत्काल प्रभाव से लंबित वेतन भुगतान करने का निर्देश दिया जाए। प्रकरण में अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी।