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फीकी पड़ी स्कूलों की चमक,मार्च क्लोजिंग का 'शॉर्ट सर्किट': फंड हुआ लैप्स

डीपीसीसी ऑफिस की लापरवाही पड़ी भारी

जबलपुर । जिले के शासकीय प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के कायाकल्प की योजना विभागीय अनदेखी के कारण अधर में लटक गई है। शासन ने स्कूलों की रंगाई-पुताई और छोटे-मोटे मरम्मत कार्यों के लिए प्रति स्कूल 12 हजार 5 सौ रुपए की दर से बजट आवंटित किया था। यह राशि वित्तीय वर्ष के अंतिम दिनों यानी 29 और 30 मार्च को जिला पोर्टल पर प्रदर्शित हुई थी। नियमानुसार इस राशि का आहरण 31 मार्च की रात तक करना अनिवार्य था, लेकिन जिला परियोजना समन्वयक कार्यालय की समय पर सूचना न देने की कार्यप्रणाली के चलते अधिकांश स्कूलों का फंड वापस सरकारी खजाने में चला गया। मात्र 2 दिन का समय शेष रहने के कारण जिले के सैकड़ों स्कूल इस महत्वपूर्ण राशि के लाभ से वंचित रह गए हैं।

​विभागीय तालमेल की कमी, चुनिंदा स्कूलों को मिला लाभ

​इस पूरे घटनाक्रम में शिक्षा विभाग के प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य स्तर से बजट आवंटन की प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद जिला स्तर से प्राचार्यों को पूर्व तैयारी के निर्देश नहीं दिए गए। यदि यह सूचना समय रहते साझा की जाती, तो स्कूल प्रबंधन समितियां कार्य आदेश और देयक संबंधी कागजी कार्रवाई पूर्ण कर सकती थीं। हालांकि, जिले के कुछ ऐसे स्कूलों में पुताई का काम पूरा हुआ है, जिनके प्रभारियों ने निजी स्तर पर जानकारी जुटाकर पहले ही काम शुरू करवा दिया था। जैसे ही पोर्टल पर बजट दिखा, उन्होंने तत्काल भुगतान प्रक्रिया पूर्ण कर ली। शेष स्कूलों के प्राचार्य अब अगले शैक्षणिक सत्र तक फंड का इंतजार करने को मजबूर हैं।

​जवाबदेही से बचते जिम्मेदार अधिकारी

​स्कूलों के बुनियादी ढांचे से जुड़ी इस लापरवाही पर विभाग के आला अधिकारियों ने चुप्पी साध रखी है। इस मामले में जिला परियोजना समन्वयक योगेश शर्मा ने स्वीकार किया है कि बजट आया था, लेकिन समय की कमी के कारण उसका उपयोग नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि अब यह राशि अगले साल ही प्राप्त हो सकेगी। इधर, स्कूलों के प्राचार्य विभागीय कार्रवाई के डर से खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं। अधिकारियों की इस लापरवाही का सीधा असर जिले की स्कूली शिक्षा व्यवस्था और भवनों के रखरखाव पर पड़ा है, जिससे अब पूरे साल स्कूल भवनों की स्थिति बदहाल बनी रहेगी।

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