जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने रेलवे प्रोजेक्ट के लिए जमीन देने के बदले नौकरी की मांग करने वाले याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि रेलवे बोर्ड की 23 सितंबर 2010 की नीति का लाभ उन मामलों में नहीं मिल सकता जहां जमीन का अधिग्रहण इस नीति के आने से पहले ही पूरा हो चुका था। कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट के पूर्व में दिए गए फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी है।
अधिग्रहण की अवधि और नीति का प्रभाव
मामला टीकमगढ़ के रहने वाले मुकेश यादव से संबंधित है जिनकी जमीन वर्ष 2006-07 में ललितपुर-खजुराहो ब्रॉडगेज लाइन के लिए अधिग्रहित की गई थी। उस समय जमीन का मुआवजा भी दिया जा चुका था। इसके बाद रेलवे ने 2010 में एक नई नीति लागू की जिसके तहत जमीन देने वाले परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का प्रावधान किया गया। याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर 2016 में नौकरी के लिए आवेदन किया जिसे रेलवे ने नामंजूर कर दिया था। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि कोई भी नीति तब तक पिछली तारीख से लागू नहीं मानी जा सकती जब तक उसमें ऐसा स्पष्ट प्रावधान न हो। 2010 की नीति को 2007 के अधिग्रहण पर लागू करना कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।
याचिका में देरी पर टिप्पणी
अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए भेदभाव के आरोपों को भी निराधार बताया। बेंच ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से लाभ मिल गया है तो वह दूसरे व्यक्ति के लिए अधिकार का आधार नहीं बन सकता। अलग-अलग समय पर किए गए अधिग्रहण अपनी अलग श्रेणी बनाते हैं इसलिए समानता का दावा स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने याचिका दायर करने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए। वर्ष 2010 की नीति के खिलाफ 2017 में याचिका दाखिल की गई थी जिसका कोई ठोस कारण नहीं दिया गया।
आजीविका व विस्थापन के तथ्य भी उठे
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि याचिकाकर्ता की पूरी जमीन अधिग्रहित नहीं हुई थी और उसके पास पर्याप्त भूमि शेष है। इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि उसकी आजीविका पूरी तरह समाप्त हो गई है। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी और पश्चिम मध्य रेलवे की ओर से अधिवक्ता अर्णव तिवारी ने पक्ष रखा। सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने कैट के फैसले को सही ठहराया।
