जबलपुर। हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय सुनाते हुए लोकायुक्त के पूर्व डीएसपी राजकुमार शर्मा की शिकायत पर इलाहाबाद बैंक के अधिकारियों के विरुद्ध दर्ज कराई गई एफआईआर को खारिज कर दिया है। जस्टिस बीपी शर्मा की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यह पूरा प्रकरण शुद्ध रूप से एक सिविल विवाद का था, जिसे जानबूझकर आपराधिक रंग देने का प्रयास किया गया। न्यायालय ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि बैंक द्वारा शुरू की गई ऋण वसूली की कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए पुलिस कार्रवाई का सहारा लेना कानून का दुरुपयोग है।
ऋण अदायगी में चूक और सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार बावड़िया कलां स्थित गुरुकुल शिक्षा समिति ने वर्ष 2010 में स्पार्टा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट के नाम पर इलाहाबाद बैंक से 97 लाख रुपए का ऋण लिया था। इस ऋण के लिए तत्कालीन डीएसपी राजकुमार शर्मा ने बतौर गारंटर अपनी विदिशा स्थित निजी संपत्ति बैंक के पास गिरवी रखी थी। ऋण लेने के दौरान संबंधित सभी दस्तावेजों, शपथ पत्रों और सहमति पत्रों पर उन्होंने स्वयं हस्ताक्षर किए थे। निर्धारित समय सीमा में संस्था द्वारा बैंक का बकाया नहीं चुकाने के कारण खाते को नॉन परफॉर्मिंग एसेट यानी एनपीए घोषित कर दिया गया। इसके पश्चात बैंक ने सरफेसी एक्ट के प्रावधानों का पालन करते हुए बंधक संपत्ति पर कब्जा लेने की वैधानिक कार्रवाई प्रारंभ की।
कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग और अदालत का निर्णय
बैंक द्वारा जब वसूली की सख्त कार्रवाई शुरू की गई, तब राजकुमार शर्मा ने हबीबगंज थाने में बैंक अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और अमानत में खयानत जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई थी। बैंक की बावड़िया कलां शाखा के एजीएम ने वर्ष 2015 में इस एफआईआर को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। बैंक की ओर से अधिवक्ता गौरव तिवारी ने दलील पेश करते हुए कोर्ट को बताया कि रिकॉर्ड में कहीं भी बैंक की नीयत में खोट या धोखाधड़ी साबित नहीं होती है। न्यायालय ने तथ्यों का अवलोकन करने के बाद पाया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं की सहमति से संपत्ति गिरवी रखी थी और बैंक ने केवल नियमों के तहत अपनी राशि वापस लेने का प्रयास किया है। अंततः अदालत ने बैंक के पक्ष में फैसला देते हुए आपराधिक प्रकरण को पूरी तरह समाप्त करने का आदेश दिया।
