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मेडिकल आयुष्मान घोटाला: सरकारी धन के गबन का आरोप, पूर्व प्रभारी डीन की भूमिका पर सवाल,अब ईओडब्ल्यू का शिकंजा

 


जबलपुर। मेडिकल कॉलेज में आयुष्मान भारत योजना की प्रोत्साहन राशि के वितरण में भारी आर्थिक अनियमितता का मामला गरमा गया है। केंद्र सरकार की इस लोक कल्याणकारी योजना में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के साथ अब यह प्रकरण आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो तक पहुंच गया है। तत्कालीन प्रभारी डीन और वर्तमान प्रोफेसर डॉ. गीता गुईन पर पद के दुरुपयोग और वित्तीय नियमों के उल्लंघन के सीधे आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता उमेश कुमार ने आरोप लगाया कि इस मामले में मेडिकल के कई अधिकारी शामिल हैं।

​प्रोत्साहन राशि में नियमों की अनदेखी

​जबलपुर स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस शासकीय मेडिकल कॉलेज में आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन के लिए तैनात डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और नर्सिंग कर्मियों को मिलने वाली इंसेंटिव राशि में धांधली की शिकायत दर्ज हुई है। आरोप है कि डॉ. गीता गुईन ने अपने कार्यकाल के दौरान बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के करोड़ों की राशि का भुगतान कर दिया। इस प्रक्रिया में शासन द्वारा निर्धारित वित्तीय नियमावली और प्रशासनिक प्रोटोकॉल को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। शिकायत के अनुसार, राशि का आवंटन करते समय पारदर्शिता का अभाव रहा और रिकॉर्ड में हेरफेर कर अपात्र लोगों को लाभ पहुंचाया गया, जबकि वास्तविक हकदार कर्मचारियों को प्रक्रिया से बाहर रखा गया।

भुगतान आदेशों का फॉरेंसिक ऑडिट कराने की मांग

​मामले की गंभीरता को देखते हुए ईओडब्ल्यू से विस्तृत जांच की गुहार लगाई गई है। शिकायतकर्ता ने डॉ. गीता गुईन के कार्यकाल के दौरान हुए सभी बैंक लेन-देन, लाभार्थियों की सूची और भुगतान आदेशों का फॉरेंसिक ऑडिट कराने की मांग की है। इसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 और भारतीय न्याय संहिता 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई करने पर जोर दिया गया है। ईओडब्ल्यू को सौंपे गए दस्तावेजों में दावा किया गया है कि यह सरकारी धन के गबन और आपराधिक न्यासभंग का स्पष्ट मामला है, जिसमें शामिल अन्य अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध है।

​कॉलेज प्रशासन में हड़कंप और भविष्य की कार्रवाई

​ईओडब्ल्यू में शिकायत दर्ज होते ही मेडिकल कॉलेज प्रबंधन में अफरा-तफरी का माहौल है। प्रशासनिक स्तर पर फाइलों की जांच शुरू कर दी गई है और कई अधिकारी इस मामले में खुद को बचाने के प्रयास में जुटे हैं। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि जांच प्रभावित न हो, इसके लिए संबंधित रिकॉर्ड को तत्काल सुरक्षित किया जाए और दोषी पाए जाने पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर रिकवरी की प्रक्रिया अपनाई जाए। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मध्य प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग में अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला साबित हो सकता है।

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