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मध्य प्रदेश ओबीसी आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला,पेंच और उलझा

 


जबलपुर। मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण के जटिल कानूनी विवाद में देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व में दिए गए आदेश में संशोधन करते हुए ओबीसी आरक्षण से संबंधित दो प्रमुख प्रकरणों को रिकॉल कर लिया है। न्यायालय के इस कदम के बाद अब मध्य प्रदेश सरकार के 87:13 फॉर्मूले की वैधता पर नए सिरे से विचार किया जाएगा। विशेष रूप से 13 प्रतिशत पद होल्ड पर रखने की प्रक्रिया की अब विस्तृत समीक्षा होगी।

​सुप्रीम कोर्ट में अप्रैल में सुनवाई

​सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वह अप्रैल के दूसरे सप्ताह में इन रिकॉल किए गए मामलों पर सुनवाई प्रारंभ करेगा। कोर्ट की इस सक्रियता से उन अभ्यर्थियों की उम्मीदें जगी हैं जो लंबे समय से भर्ती प्रक्रियाओं के परिणाम का इंतजार कर रहे हैं। इस दौरान आरक्षण के प्रतिशत और उसे लागू करने के प्रशासनिक तरीकों पर कानूनी विशेषज्ञों की दलीलें सुनी जाएंगी। दिल्ली स्थित शीर्ष अदालत ने राज्य की परिस्थितियों को देखते हुए प्रक्रियात्मक सुधार की दिशा में यह बड़ा कदम उठाया है।

​मप्र हाईकोर्ट को बड़ी जिम्मेदारी

​न्यायिक विकेंद्रीकरण और मामलों के त्वरित निपटारे के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने 54 अन्य याचिकाओं को वापस जबलपुर हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया है। अब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की संवैधानिकता के मूल प्रश्न पर अंतिम सुनवाई करेगा। इसके अतिरिक्त आरक्षण विवाद से जुड़ी अन्य 103 लंबित याचिकाओं पर भी जबलपुर हाईकोर्ट में ही विचार किया जाएगा। इस स्थानांतरण से अब आरक्षण की संवैधानिकता और उसकी विसंगतियों पर प्रदेश स्तर पर सघन कानूनी मंथन का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

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