जमीन धोखाधड़ी में एफआईआर के लिए 6 महीने का इंतजार, मुख्य आरोपियों को जांच से पहले ही मिली क्लीन चिट
जबलपुर। न्याय प्रणाली में पुलिस की भूमिका पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की होती है, लेकिन जबलपुर के बरेला थाना क्षेत्र से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने खाकी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ एक साधारण नागरिक को महज एक एफआईआर दर्ज कराने के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। चौंकाने वाली बात यह है कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद स्थानीय पुलिस ने महीनों तक मामले को लटकाए रखा और जब रिपोर्ट दर्ज की भी, तो उसमें से मुख्य आरोपियों के नाम 'गायब' कर दिए गए। यह पूरा मामला बृजेश दुबे नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2014 में ग्राम सिलुआ में एक जमीन खरीदी थी। 2018 में आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने कुछ परिचितों से उधार लिया था। आरोप है कि इस उधारी की आड़ में भारी ब्याज और दबाव का खेल खेला गया। पीड़ित का कहना है कि साजिश के तहत उनकी जमीन का मुख्तारनामा (पावर ऑफ अटॉर्नी) करा लिया गया और बाद में उनकी सहमति के बिना रजिस्ट्री भी कर ली गई। जब स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं हुई, तो पीड़ित ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
छह आरोपियों के नाम थे शिकायत में, पुलिस ने पांच नाम काटे
हाईकोर्ट ने 20 अगस्त 2025 को मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे संज्ञेय अपराध माना और पुलिस को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। बावजूद इसके, बरेला पुलिस करीब छह महीने तक कुंडली मारकर बैठी रही। जब पीड़ित ने कोर्ट की अवमानना याचिका लगाने की तैयारी की, तब जाकर कहीं 23 फरवरी 2026 को पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। लेकिन असली खेल एफआईआर दर्ज होने के बाद शुरू हुआ। पीड़ित ने अपनी शिकायत में शुभम चौबे के साथ-साथ राजेश खुल्लर, शांति लाल जैन, विध्या जैन, मिथुन दुबे और संगीता खुल्लर को नामजद किया था। आरोप था कि इन सभी ने मिलकर साजिश रची और जमीन हड़प ली। परंतु, बरेला पुलिस ने अपनी 'जादूगरी' दिखाते हुए एफआईआर से 5 नाम हटा दिए और केवल शुभम चौबे के खिलाफ मामला दर्ज किया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किस आधार पर बाकी पांच लोगों को जांच से पहले ही बचा लिया गया? क्या यह पुलिस की 'चयनात्मक' कार्रवाई है या किसी रसूखदार का दबाव?
कोर्ट की फटकार के बाद भी सुस्त जांच, मुख्य आरोपी अब भी गिरफ्त से बाहर
पुलिस की कार्यशैली पर दूसरा बड़ा सवाल उनकी सुस्त रफ्तार को लेकर है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 308(2), 308(3) और 318(4) जैसी गंभीर धाराओं में मामला दर्ज होने के बावजूद अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। स्थानीय लोगों के बीच चर्चा है कि मुख्य आरोपी क्षेत्र में बेखौफ घूम रहा है, जबकि पुलिस उसे पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है।
