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रादुविवि चुनाव में कुर्सी की जंग तेज, गहराया सस्पेंस



जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में गैर-शिक्षण कर्मचारी संघ के चुनावों को लेकर एक बार फिर असमंजस की स्थिति बन गई है। काफी प्रयासों के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति तो कर दी लेकिन अब मतदाता सूची पर सहमति न बन पाने के कारण नया विवाद खड़ा हो गया है। इस गतिरोध की वजह से चुनाव कार्यक्रम की विधिवत घोषणा नहीं हो पा रही है। चुनावी प्रक्रिया के तहत कुलपति की सहमति से निर्वाचन अधिकारी अपना काम शुरू करते हैं और अधिसूचना जारी की जाती है। इस चरण के बाद संघ की प्रमाणित मतदाता सूची चुनाव अधिकारी को सौंपी जाती है ताकि उसका प्रकाशन किया जा सके। वर्तमान में संघ के दो उपाध्यक्षों और महासचिव ने मिलकर मतदाता सूची तैयार की है लेकिन अध्यक्ष वीरेंद्र पटेल उस पर हस्ताक्षर करने से पीछे हट रहे हैं।

​मतदाता सूची व प्रशासनिक विवाद

​अध्यक्ष वीरेंद्र पटेल का तर्क है कि हस्ताक्षर करने से पहले उन्हें संघ के पूरे वर्ष के लेन-देन का हिसाब चाहिए। वे महासचिव से वार्षिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करने की मांग कर रहे हैं। हालांकि विपक्षी गुट का कहना है कि संघ का बैंक खाता स्वयं अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष के हस्ताक्षर से संचालित होता है इसलिए हिसाब मांगने का यह आधार निराधार है। इस खींचतान के कारण कर्मचारी गुटों के बीच आपसी टकराव बढ़ता जा रहा है। एक तरफ वीरेंद्र पटेल का समूह चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में देरी कर रहा है तो दूसरी तरफ प्रेम प्रकाश पुरोहित, वंश बहोर पटेल और संजय यादव का गुट तुरंत चुनाव कराने पर अड़ा है। वीरेंद्र पटेल ने आगामी 16 मार्च को एक आमसभा भी आयोजित करने का निर्णय लिया है जिसका अन्य गुट कड़ा विरोध कर रहे हैं। मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है क्योंकि दोनों ही पक्ष अपनी अपनी दलीलों पर कायम हैं।

​कार्यकाल की समाप्ति, कुलपति से हस्तक्षेप की मांग

​पूर्व उपाध्यक्ष प्रेम प्रकाश पुरोहित ने वैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि कर्मचारी संघ के पदाधिकारियों का कार्यकाल नियमानुसार सिर्फ 1 वर्ष का होता है। यह अवधि 2 मार्च को ही पूरी हो चुकी है। उनका मानना है कि कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद अब कोई भी वर्तमान पदाधिकारी संघ के लेटरपैड या मुहर का उपयोग करने का वैध अधिकारी नहीं रह गया है। पुरोहित के अनुसार वीरेंद्र पटेल द्वारा 16 मार्च के लिए बुलाई गई आमसभा पूरी तरह से गलत और असंवैधानिक है। यदि उन्हें कोई सभा बुलानी थी तो वह कार्यकाल समाप्त होने वाली तारीख यानी 2 मार्च से पहले बुलाई जानी चाहिए थी। विपक्षी गुट ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि अध्यक्ष बिना चुनाव कराए विश्वविद्यालय प्रशासन के संरक्षण में पद का लाभ लेना चाहते हैं। अब इस विवाद का समाधान विश्वविद्यालय के कुलपति के हाथों में है क्योंकि वे ही संघ के संरक्षक की भूमिका में हैं। कर्मचारियों ने मांग की है कि कुलपति इस विषय पर त्वरित निर्णय लें और चुनाव की नई तिथियों की घोषणा करवाकर विवाद को समाप्त करें।

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