नई दिल्ली/मुंबई। बजट के बाद अब आम आदमी समेत शेयर बाजार और अर्थशास्त्रियों की नजर 6 फरवरी 2026 को होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति बैठक पर है। उससे पहले अधिकतर बड़े आर्थिक संस्थानों के अर्थशास्त्रियों की राय एक जैसी नजर आ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक फिलहाल महंगाई के रुझान, रुपये की चाल और वैश्विक हालात को और साफ तौर पर समझना चाहेगा, इसलिए रुककर देखने की रणनीति अपनाई जा सकती है।
अर्थशास्त्रियों का अनुमान ; अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, आने वाले समय में रुपये पर दबाव, ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता और विदेशी पूंजी के प्रवाह जैसे फैक्टर नीति फैसलों को प्रभावित करेंगे। अगर वैश्विक उतार-चढ़ाव ज्यादा समय तक बना रहता है, तो आरबीआई को रुपये को शॉक एब्जॉर्बर की तरह काम करने देना चाहिए, बजाय इसके कि विदेशी मुद्रा भंडार का ज्यादा इस्तेमाल किया जाए।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, अगर रुपये में जरूरत से ज्यादा गिरावट आती है, तो इसका असर निवेशकों के व्यवहार पर पड़ सकता है। इससे विदेशी निवेश आने में देरी हो सकती है। ऐसे में आरबीआई की ओर से रुपये के वैल्यूएशन को लेकर साफ संकेत या गाइडेंस मिलना निवेशकों के लिए काफी मददगार साबित हो सकता है।
नए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) सीरीज़ को लेकर अनिश्चितता भी रेपो रेट में फिलहाल बदलाव न करने की बड़ी वजह है। उनके अनुसार, नई सीरीज़ में खाने-पीने और सेवाओं के वेटेज बदलने से महंगाई करीब 50 बेसिस प्वाइंट ज्यादा दिख सकती है। इस ट्रांजिशन के दौरान MPC को महंगाई की दिशा और उसकी गति पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
