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एमपी के सरकारी कैलेंडर पर अफ्रीकी इम्पाला की तस्वीर छपने से मचा बवाल

 
भोपाल।
मध्य प्रदेश सरकार के शासकीय कैलेंडर में छपी एक हिरण की तस्वीर ने सियासी हलचल तेज कर दी है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ङ्ग पर कैलेंडर की तस्वीर साझा कर मुख्यमंत्री को टैग करते हुए सवाल उठाया कि जो प्राणी न तो मध्य प्रदेश में पाया जाता है और न ही भारत में, उसकी तस्वीर सरकारी प्रकाशन में क्यों लगाई गई?

दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि कैलेंडर में छपा प्राणी इम्पाला है, जो अफ्रीका का मूल निवासी है। उन्होंने सलाह दी कि सरकारी प्रकाशनों में चित्रों का चयन सोच-समझकर किया जाना चाहिए। उनका यह पोस्ट वायरल हो गया और राजनीतिक बहस छिड़ गई।

स्थानीय वन्यजीवों की जगह विदेशी प्राणी क्यों?

मध्य प्रदेश वन्यजीव संरक्षण के लिए देशभर में जाना जाता है। यहां बारहसिंघा, चीतल, काला हिरण और बाघ जैसे दुर्लभ वन्यजीव पाए जाते हैं। ऐसे में अफ्रीकी इम्पाला की तस्वीर छपने से सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। कैलेंडर के जनवरी माह के पृष्ठ पर हिरणों का एक झुंड दिखाई दे रहा है, जिसमें लंबे घुमावदार सींग वाले नर और मादाएं घास चरते नजर आ रहे हैं। नीचे मध्य प्रदेश शासन का लोगो और हिंदी-अंग्रेजी में तारीखें अंकित हैं। विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ एक तस्वीर की गलती नहीं, बल्कि छवि चयन प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही का संकेत है।

विपक्ष का हमला, सरकार का पलटवार

पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह ने इसे बड़ी त्रुटि बताते हुए वन विभाग को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि हजारों स्थानीय वन्यजीवों की तस्वीरें उपलब्ध होने के बावजूद ऐसी चूक प्रशासनिक अराजकता दर्शाती है। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि करोड़ों रुपये खर्च कर छपने वाले कैलेंडर में स्थानीय जैव विविधता को नजरअंदाज करना राज्य की पहचान को कमजोर करता है। वहीं सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कांग्रेस पर नकारात्मक राजनीति करने का आरोप लगाया और इसे अनावश्यक विवाद बताया।

सरकारी प्रकाशन और खर्च पर सवाल

राज्य सरकार हर साल लाखों कैलेंडर छपवाती है, जिन पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। विपक्ष का कहना है कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने से पहले तस्वीरों का सत्यापन जरूरी था। यह विवाद हाल ही में सामने आए सरकारी डायरी विवाद के बाद और भी संवेदनशील हो गया है। मध्य प्रदेश में 10 राष्ट्रीय उद्यान और 25 वन्यजीव अभयारण्य हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे प्रकाशनों के लिए वन विभाग से अनिवार्य अनुमोदन लिया जाना चाहिए, ताकि राज्य की जैव विविधता की सही तस्वीर सामने आए।

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